कोरोना खौफ : गांवों में जो अपनों पर जान छिड़कते थे, वो आज हो गए है बेगाने

कोरोना  खौफ : गांवों में जो अपनों पर जान छिड़कते थे, वो आज हो गए है बेगाने

कोरोना का ऐसा खौफ! गांव के लोगों की क्या कहें अपनों ने भी दूरी बना ली। रिश्ते जिनमें कभी गर्माहट थी, जो अपनों पर जान छिड़कते थे, वो भी बेगाने हो गए। अपनापन दिखाएं भी तो कैसे?

खुद की जान को भी तो खतरा है। ऐसे में बिस्तर-बर्तन अलग कर रहे हैं। घर के बाहर ही अपनों को क्वारंटीन कर रहे हैं। डर ऐसा घर कर गया है कि कई जगह तो टकराव की नौबत आ रही है। जो फिजां कभी अपनेपन के लिए जानी जाती थी, उसमें कड़वाहट घुलने लगी है। तनाव बढ़ रहा है। गांवों में बदलते हालात पर पेश है रिपोर्ट...।

निगोहां के नया खेड़ा निवासी नन्हा 17 मई को दिल्ली से गांव आए। मां फुलवासी रोते-रोते बताती हैं कि माहौल को देखते हुए उन्होंने घर के बगल में पंचायत घर में बेटे को भेज दिया है। हालांकि हम घर में ही उन्हें क्वारंटीन करना चाहते थे। नन्हा शौच के लिए निकलने में भी डरते हैं, कहते हैं कि दरअसल हर कोई संक्रमण को लेकर आशंकाओं से घिरा है। प्रशासन से भी कोई सहायता नहीं मिल रही है। फुलवासा कहती हैं कि बेटे को दूर से ही देखकर लौट आती हूं। 

मनरेगा में काम तो मिला, लेकिन साथी दूर भागते थे
निगोहां के अघईया निवासी शिवकुमार व समरजीत 27 मार्च को दिल्ली से गांव पहुंचे थे। गांव वालों नें जमकर विरोध किया, लेकिन मिन्नतों के बाद घर में ही क्वारंटीन किए जाने  पर राजी हुए। 14 दिन बाद मनरेगा में काम करने पहुंचे शिवकुमार बताते हैं कि काम के दौरान सभी मजदूर साथी मुझसे दूर भागते थे। सभी को समझाते-समझाते अब जाकर गाड़ी पटरी पर आई।

लखनऊ के माल क्षेत्र में बीते एक सप्ताह में बड़ी संख्या में प्रवासी मजदूर पहुंचे हैं। इन्हें पंचायत भवनों, घरों, स्कूलों में क्वारंटीन किया गया था, लेकिन वे खुलेआम घूम रहे थे। ग्रामीण इलाकों में कोरोना संक्रमितों की संख्या बढ़ने से सबकी चिंता बढ़ी। गांव वाले सख्त हो गए और ऐसे लोगों को गांव से निकाले जाने की बात उठने लगी। परिवारीजनों ने हालात को समझा और खुद ही अपने प्रियजन पर पाबंदी लगानी शुरू कर दी। फिलहाल घर आए लोग क्वारंटीन की अवधि तक खुले में नहीं घूमेंगे। रज्जन सिंह इनमें से एक हैं, जिन्हें अपने घर में हैंडपंप, चारपाई व अन्य सामान छूने तक की मनाही है। उनका बर्तन, बिस्तर, बाल्टी, मग सब अलग कर दिया गया है।  
 

भय के मारे अलग कमरे में बंद किया, वहीं दे रहे खाना-पानी
सरोजनीनगर क्षेत्र में अब तक कुल 575 कामगार दूसरे शहरों से लौटकर आए हैं। पर ज्यादातर की पीड़ा है कि गांव वालों के साथ-साथ घर वाले भी परायों जैसा व्यवहार कर रहे हैं। सरोजनीनगर के बंथरा,नटकुर, रहीमाबाद व बिजनौर ग्राम पंचायतों में लौटे कामगारों का कहना है कि उन्हें एक कमरे में सीमित कर दिया गया है। यही नहीं कुछ परिवारों में तो इतना भय है कि वे कामगारों को बाहर ही नहीं निकलने दे रहे हैं। यहां के नटकुर गांव में मुबंई से लौटकर आए शशिकांत को पत्नी सरिता एवं बेटे के साथ घर वालों ने एक कमरे में रख दिया है और उन्हें वहीं पर खाना-पानी दिया जा रहा है।

होम क्वारंटीन पर राजी नहीं हुए ग्रामीण, गांव के बाहर भेजे गए
मलिहाबाद क्षेत्र के पुरवागांव में 15 मई को प्रवासी मजदूर महाराष्ट्र से वापस लौटे। गांव लौटने वाले प्यारेलाल, प्रमोद, प्रदीप संदीप व अन्य की मेडिकल जांच कराई गई। स्थिति सामान्य होने पर 14 दिन के लिए होम क्वारंटीन किया गया। गांव के कुछ लोग विरोध पर उतर आए और उन्हें गांव से बाहर रखने को उकसाया। इसी तरह कुछ और मजदूर लौटे, लेकिन गांववालों ने होम क्वारंटीन नहीं होने दिया। विरोध को देखते हुए उन्हें गांव के बाहर स्कूल में रखा गया। 
 

ससुराल में मिली पनाह, पर गांव में जमकर विरोध
उन्नाव के औरास थाना क्षेत्र के गांव सुभानी खेड़ा गांव निवासी मजदूर रामरतन कोरोना काल के दौरान अपने गांव वापस लौटा। परिवार वालों ने घर में घुसने नहीं दिया। वह मलिहाबाद स्थित सरैया गांव स्थित अपनी ससुराल पहुंचा। यहां पर भी उसे गांव के लोगों के विरोध का सामना पड़ा। मगर बाद में उसकी ससुराल वालों ने उसे घर में रख लिया। इसे लेकर गांव में विरोध है। 

नगराम में भी जबरदस्त विरोधः माल-मलिहाबाद की तरह ही नगराम के इलाकों में भी अन्य प्रदेशों से लौट रहे मजदूरों को लेकर माहौल में तनाव है। कोरोना के दहशत में गांव वालों के विरोध का सामना करना पड़ा। गांव वालों ने होम क्वारंटीन की अनुमति नहीं दी। निगरानी  समिति ने किसी तरह स्कूल में क्वारंटीन कराया।