कैप्टन कोहली के चेहरे पर आई मुस्कान , एक वर्ष में मिला ये बड़ा तोहफा

कैप्टन कोहली के चेहरे पर आई मुस्कान , एक वर्ष में मिला ये बड़ा तोहफा

दक्षिण अफ्रीका (South Africa) के विरूद्ध तीन मैचों की सीरीज का पहला टेस्ट जीतने के बाद भारतीय कैप्टन विराट कोहली (Virat Kohli) के चेहरे पर मुस्कुराहट की एक वजह व थी। वो वजह विशाखापत्तनम टेस्ट में प्रयोग की गई एसजी बॉल (SG Ball) थी, जिसे लेकर कैप्टन कोहली बहुत ज्यादा खुश नजर आए। मगर ये बात किसी से छिपी नहीं है कि विराट कोहली ने करीब एक वर्ष पहले एसजी बॉल को लेकर कितनी कड़ी नाराजगी जताई थी। उन्होंने यहां तक बोला दिया था कि अगर संभव हो तो दुनियाभर में टेस्ट क्रिकेट (Test Cricket) के लिए ड्यूक गेंद का प्रयोग किया जाना चाहिए। विराट कोहली ने बोला था कि एसजी बॉल कुछ समय में ही ढीली हो जाती है व अपनी चमक खो देती है, जिससे तेज गेंदबाजों को अधिक मदद नहीं मिलती। विराट कोहली के अतिरिक्त तेज गेंदबाज उमेश यादव व ऑफ स्पिनर आर। अश्विन भी एसजी बॉल की गुणवत्ता पर सवाल उठा चुके हैं।



गेंदबाज आपको चुनौती देते हैं टेस्ट क्रिकेट का मजा यही है
मगर एक वर्ष बाद मानो विराट कोहली (Virat Kohli) की मुराद पूरी हो गई। विशाखापत्तनम टेस्ट जीतकर जब बात बयान देने की आई तो भारतीय कैप्टन ने साफ कर दिया कि इस मैच में प्रयोग की गई एसजी बॉल बहुत ज्यादा शानदार थी। उन्होंने कहा, 'एसजी बॉल का ये लॉट बहुत ज्यादा बेहतर है। यानी कुछ तो सुधार हुआ है। हम चाहते हैं कि गेंद 80 ओवर तक हार्ड बनी रहे। अगर ये 40-45 ओवरों के बाद ही नरम पड़ जाएगी तो मैच में कुछ नहीं होगा। ये टेस्ट क्रिकेट (Test Cricket) के लिए आदर्श स्थिति नहीं है। हार्ड बॉल से बल्लेबाजों के लिए मुश्किलें आतीं हैं। अगर गेंद 80 ओवरों तक हार्ड न भी रहे तो भी 60 ओवरों तक तो होनी ही चाहिए। इससे मैच में बने रहने में मदद मिलती है। गेंदबाज आपके सामने मुश्किलें पेश करते हैं। यही टेस्ट क्रिकेट का मजा है। '

एसजी, कूकाबुरा व ड्यूक गेंद में अंतर यू समझिए
एसजी बॉल : एसजी गेंद (SG Ball) हिंदुस्तान में बनती है व यहां टेस्ट मैच इसी से खेला जाता है। एसजी गेंद की सिलाई सबसे बढ़िया होती है लेकिन भारतीय दशा में 10-20 ओवर तक ही इसमें स्विंग मिलती है व यह अपनी चमक खो देती है। इसकी सीम 80-90 ओवर तक रहती है जिससे इससे रिवर्स स्विंग की आसार बनी रहती है। इसके अतिरिक्त इस गेंद से स्पिनरों को ग्रिप बनाने में भी बहुत ज्यादा सरलता होती है।

कूकाबुरा गेंद : ये गेंद ऑस्ट्रेलिया में बनती है व इसका प्रयोग ऑस्ट्रेलिया के अतिरिक्त द। अफ्रीका, पाकिस्तान, न्यूजीलैंड, श्रीलंका, जिम्बाब्वे और न्यूजीलैंड में होता है। 20-25 ओवरों के बाद जब सिलाई ढीली पड़ने लगती है, तो ये स्विंग करने में मददगार हो जाती है। लेकिन स्पिनर्स आमतौर पर इन गेंदों को पसंद नहीं करते, क्योंकि ये स्पिनर्स के लिए मददगार नहीं होतीं। कूकाबुरा गेंदों में अंदर कार्क व सफेद मोटे धागे का धागे का प्रयोग होता है। कार्क को गोल आकार में ढालकर उनके ऊपर सफेद धागों को लपेटकर एक सतह बनाई जाती है। फिर उन्हें चमड़े के दो अर्धगोलाकार खोल में डालकर मशीनों से सिला जाता है। आमतौर पर इनके दाम 1200 रुपये से लेकर 2400 रुपये तक होगा।

ड्यूक गेंद : ये गेंदें इंग्लैंड में बनती हैं व इसका प्रयोग इंग्लैंड के अतिरिक्त वेस्टइंडीज में होता है। ड्यूक बॉल की सीम शानदार होती है व 50-55 ओवर तक यह बनी रहती है। यह बढ़िया स्विंग करती है। यह तेज गेंदबाजों की सबसे ज्यादा मददगार गेंद है। इस गेंद की सिलाई, स्विंग व उछाल गेंदबाजों के लिए वरदान साबित होती है। ड्यूक गेंद अंदर व बाहर दोनों तरफ स्विंग करती है। यही इसकी सबसे बड़ी अच्छाई है। डयूक गेंद की भारतीय उपमहाद्वीप में भी स्विंग कर सकती है। ड्यूक की एक सिंगल गेंद की सिलाई में तीन से साढ़े तीन घंटे का वक्त लगता है। इस गेंद की दूसरी अच्छाई यह है कि इसकी शाइन बहुत देर तक बनी रहती है।