क्या है फांसी देने के समय को लेकर प्रशासकीय पहलू , पढ़े

क्या है फांसी देने के समय को लेकर प्रशासकीय पहलू  , पढ़े

ये सवाल अक्सर पूछा जाता रहा है कि हिंदुस्तान (India) में फांसी (Capital Punishment) लंबे समय से सूर्योदय से पहले (तड़के) ही क्यों दी जाती है। अंग्रेजों के जमाने में भी फांसी की सजा कारागार में प्रातः काल सूरज की पहली किरण से पहले ही दी जाती थी। वैसा ही अब भी हो रहा है। हिंदुस्तान में आखिरी फांसी पुणे कारागार में साल 2012 में हुई थी। तब आतंकी अजमल कसाब को फांसी पर लटकाया गया था। ये भी भोर में ही दी गई थी।

केवल हिंदुस्तान में ही नहीं बल्कि दुनियाभर में जहां कहीं भी फांसी देने का रिवाज अभी जारी है, वहां फांसी भोर में ही दी जाती है। हालांकि हिंदुस्तान के कारागार मैन्यूल में फांसी के समय के बारे में स्पष्ट गाइड लाइन हैं। कारागार मैन्युअल कहता है कि फांसी प्रातः काल तड़के ही दी जानी चाहिए, ये हमेशा सूरज की पहली किरण से पहले संपन्न हो जाए।

हालांकि हर मौसम के हिसाब से फांसी का समय प्रातः काल बदल जाता है लेकिन ये समय भी तय करने का कार्य केन्द्र व प्रदेश सरकारें ही करती हैं। फांसी को प्रातः काल तड़के शांत बेला में देने की तीन वजहें भी हैं, जो प्रशासनिक, व्यावहारिक व सामाजिक पहलुओं से जुड़ी हैं।

क्या है फांसी देने के समय को लेकर प्रशासकीय पहलू

आमतौर पर फांसी एक खास घटनाक्रम होता है। अगर ये दिन के दौरान होंगी तो कारागार का सारा फोकस इसी पर टिक जाएगा। इससे बचने की प्रयास की जाती है ताकि कारागार की दिनभर की अन्य गतिविधियों पर कोई प्रभाव नहीं पड़े।  सारी गतिविधियां सुचारू तौर पर कार्य करती रहें। फांसी होने के बाद मेडिकल परीक्षण होता है व उसके बाद कई तरह की कागजी कार्यवाहियां। इन सबमें भी समय लगता है।



व्यावहारिक पहलू फांसी पाने से जुड़ा है

ये माना जाता है कि जिस फांसी दी जा रही है, उसका मन प्रातः काल भोर के समय में ज्यादा शांत रहता है। सोकर उठने के बाद फांसी देने पर वो ज्यादा शारीरिक तनाव व दबाव का शिकार नहीं होता। अगर फांसी दिन में हो तो सजायाफ्ता का तनाव व मानसिक स्थिति बिगड़ सकती है।

जिसे फांसी होती है, उसे प्रातः काल तीन बजे ही उठना होता है ताकि वो अपने सारे कार्य फांसी से पहले निपटा ले, जिसमें प्रार्थना व अकेले में कुछ समय के लिए अपने बारे में सोच-विचार करना आदि भी शामिल है। सबसे बड़ी बात है कि फांसी के बाद उसके परिजनों को मृत शरीर सौंप दिया जाए, ताकि वो उसे लेकर अपने गंतव्य तक जा सकें व दिन में ही अंतिम संस्कार कर लें।

सामाजिक पहलू यानि हंगामा नहीं हो
फांसी का तीसरा पक्ष सामाजिक है। चूंकि ये खास घटना होती है लिहाजा बड़े पैमाने पर लोगों का ध्यान आकर्षित करती है। इसके चलते कारागार के बाहर बड़े पैमाने पर तमाशबीन इकट्ठा होने व हंगामा होने के भी संभावना होते हैं। लिहाजा प्रयास होती है कि जब तक लोग सोकर उठें तब तक फांसी हो जाए।

किस तरह होती है फांसी की तैयारियां
फांसी के करीब 10-15 दिन पहले खास प्लेटफार्म तैयार कर दिया जाता है। ये जमीन से करीब चार फुट ऊंचा होता है। इस प्लेटफॉर्म पर सजायाफ्ता को एक लकड़ी के पटरे पर खड़ा किया जाता है, जिसे गोलाकार तौर पर चिन्हित किया जाता है।
जिस टी शेप खंबे से रस्सी का फंदा लटकाया जाता है, वो करीब दस फीट ऊंचा होता है। साथ ही इसमें छह मीटर की रस्सी का प्रयोग होता है

यही वो पटरा होता जो जल्लाद के लिवर खींचते ही हट जाता है व सजायाफ्ता शख्स गर्दन पर लगे फंदे के साथ झूल जाता है।

जिस टी शेप खंबे से रस्सी का फंदा लटकाया जाता है, वो करीब दस फीट ऊंचा होता है। साथ ही इसमें छह मीटर की रस्सी का प्रयोग होता है

फंदा गर्दन पर कसते ही शरीर में क्या होता है
जैसे ही जल्लाद लिवर को खींचता है, वैसे ही जिस पटरे पर फांसी पाने वाला शख्स खड़ा होता है, वो पटरा नीचे चला जाता है, तब वो तुरंत लटकने लगता है व रस्सी का दबाव गर्दन पर कसने लगता है। शरीर का पूरा वजन नीचे की ओर जाने लगता है।

ऐसे में पहले गर्दन लंबी होती है व फिर गर्दन की मांसपेशियां टूटने लगती हैं। इससे मस्तिष्क का सम्पर्क शरीर से टूट जाता है, चेतना समाप्त हो जाती है। जिसे फांसी दी जा रही है, वो अचेत हो जाता है। साथ ही दिल की ओर खून का बहाव रुक जाता है व सांस लेने की प्रक्रिया भी गला घुटने से बंद हो जाती है।

आमतौर पर फांसी लगने के बाद पांच मिनट से लेकर 20-25 मिनट के भीतर मृत्यु हो जाती है। उसके बाद चिकित्सक बॉडी को चेक करता है व सजायाफ्ता शख्स को मृत घोषित करता है।