जिसके तहत उमर खालिद हुए गिरफ्तार, क्या है वो UAPA कानून

जिसके तहत उमर खालिद हुए गिरफ्तार, क्या है वो UAPA कानून

दिल्ली दंगों (Delhi Riots) के सिलसिले में साज़िश रचने के आरोप लगाकर जेएनयू (JNU) के पूर्व विद्यार्थी नेता उमर खालिद (Umar Khalid) की गिरफ्तारी दिल्ली पुलिस (Delhi Police) की स्पेशल सेल ने गैर-कानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम (UAPA) के तहत की। इसी कानून के तहत पहले भी कई प्रसिद्ध व सामाजिक ​ शख़्सियतों (Social Activists) को हिरासत में लिया जा चुका है। एक वर्ष पहले जब यह कानून संसद (Parliament) में पास हो रहा था, तब भी इस पर बहुत ज्यादा हो हल्ला हुआ था व बोला गया था कि इससे संवैधानिक अधिकारों का हनन होता है।

कुछ दलों के समर्थन व कुछ के विरोध के बीच केन्द्र की भाजपानीत एनडीए सरकार (NDA Government) ने इस कानून को पास करवा लिया था, लेकिन तबसे ही यह कानून इसलिए चर्चा में रहा है कि ये सरकार व जाँच एजेंसियों को असीमित शक्तियां देता है व इसके दुरुपयोग की संभावना बनी रहती है। जानिए कि से जुड़ा यह कानून यूएपीए कितना कठोर है व इससे जुड़ी तमाम खास बातें भी।

कितना कठोर है UAPA?
यूएपीए के तहत देश व देश के बाहर अवैध गतिविधियों को रोकने के मकसद से बेहद कठोर प्रावधान किए गए। 1967 के इस कानून में पिछले वर्ष सरकार ने कुछ संशोधन करके इसे कड़ा बना दिया। केन्द्र की जाँच एजेंसियां व प्रदेश सरकारें आतंक व नक्सलवाद से बेहतर तरीका से निपट सकें इसलिए 2019 में एनडीए सरकार ने इस कानून में कुछ व प्रावधान जोड़े। इस एक्ट के प्रावधानों को समझें :

यूएपीए में आदमी को आतंकी घोषित किए जाने का प्रावधान किया गया।


- कानून सारे देश में लागू होता है।
- इस कानून के तहत केस में एंटीसिपेटरी बेल यानी अग्रिम ज़मानत नहीं मिल सकती।
- किसी भी भारतीय या विदेशी के विरूद्ध इस कानून के तहत केस चल सकता है। क्राइम की लोकेशन या प्रवृत्ति से कोई फर्क नहीं पड़ता।
- विदेशी भूमि पर अपराध किए जाने के मुद्दे में भी इसके तहत मुकदमा दर्ज होने कि सम्भावना है।
- हिंदुस्तान में रजिस्टर जहाज़ या विमान में हुए क्राइम के मामलों में भी यह कानून लागू होने कि सम्भावना है।
- मुख्य तौर पर यह कानून आतंकवाद व नक्सलवाद से निपटने के लिए है।
- किसी भी तरह की व्यक्तिगत या सामूहिक अवैध गतिविधि, जिससे देश की सुरक्षा, एकता व अखंडता को खतरा हो, इस कानून के दायरे में है।
- यह कानून राष्ट्रीय इनवेस्टिगेशन एजेंसी (NIA) को अधिकार देता है कि वो किसी तरह की आतंकवादी गतिविधि में शामिल संदिग्ध को आतंकी घोषित कर सके।
- इस कानून से पहले समूहों को ही आतंकी घोषित किया जा सकता था, लेकिन 2019 में इस संशोधित कानून के बाद किसी आदमी को भी संदिग्ध आतंकवादी या आतंकी घोषित किया जा सकता है।

किस तरह NIA की ताकत बढ़ाता है कानून?
पहले यह व्यवस्था थी कि आतंकवाद के किसी भी मुद्दे में संपत्ति सीज करने की कार्यवाही जाँच ऑफिसर बगैर डीजीपी की अनुमति के कर नहीं सकता था, लेकिन इस कानून में प्रावधान है कि एनआईए का जाँच अधिकारी सिर्फ एनआईए के डीजी की इजाज़त से यह कार्रवाई कर सकता है। यानी यह कानून दे देता है।

यही नहीं, आतंक से जुड़े किसी भी मुद्दे में किसी आदमी के किसी भी तरह के कमिटमेंट, आतंक की तैयारी में सहभागिता, आतंक को बढ़ावा देने या किसी भी तरह की संलिप्तता के आधार पर, यहां तक कि संदेह के आधार पर भी किसी आदमी को आतंकी घोषित करने की कार्रवाई केन्द्र की एजेंसी कर सकती है।

यह भी बताते चलें कि पहले नियमानुसार, आतंक संबंधी किसी भी मुद्दे की जाँच डीएसपी या असिस्टेंट कमिश्नर (एसीपी) रैंक के ऑफिसर कर पाते थे, लेकिन इस कानून के बाद से NIA इंस्पेक्टर रैंक या उससे ऊपर के अधिकारी इन मामलों में जाँच ​अधिकारी हो सकते हैं।

सरकार व विपक्ष की दलील
केन्द्र की दलीलें ये रहीं कि यूएपीए के कड़े प्रावधानों से NIA की जाँच तेज़ व मज़बूत होगी, वह आतंकवादी गतिविधियों में संदेह के आधार पर कार्रवाई कर जल्दी रिज़ल्ट दे सकेगी, संदिग्ध गतिविधियों वाले संगठनों को आतंकवादी घोषित कर कार्रवाई कर सकेगी व जाँच में प्रदेश के साथ सामंजस्य की अड़चन भी समाप्त होगी। ऐसे में अपराधियों की धरपकड़ बढ़ेगी, लेकिन विपक्ष का बोलना रहा कि इससे एनआईए की मनमानी बढ़ेगी व अल्पसंख्यकों के विरूद्ध कानून का दुरुपयोग होगा।

एनआईए को कई तरह की ताकतें यूएपीए कानून ने दीं।
UAPA में अरैस्ट हुईं कई हस्तियां
उमर खालिद से पहले कई एक्टिविस्टों व सामाजिक शख़्सियतों को इस एक्ट के तहत हिरासत में लिया जा चुका है। वर्ष 2007 में नक्सली गतिविधि का आरोप लगाकर प्रसिद्ध चिकित्सक व मानव अधिकार कार्यकर्ता बिनायक सेन, 2018 में दलित अधिकार के लिए कार्य करने वाले सुधीर धवाले, आदिवासियों के लिए कार्य करने वाले महेश राउत, प्रसिद्ध कवि वरवर राव को हिरासत में लिया जा चुका है।

वर्ष 2018 में ही आदिवासी अधिकारों के लिए संघर्षरत सुधा भारद्वाज, रिसर्च स्कॉलर रोना विल्सन व पत्रकार गौतम नवलखा पर भी यही कानून लगा था। इसी साल, यह कानून तब चर्चा में था, जब जम्मू और कश्मीर पुलिस (Jammu Kashmir Police) ने घाटी में सोशल मीडिया (Social Media) का गलत ढंग से प्रयोग करने वाले यूजर्स पर UAPA (Unlawful Activities Prevention Act ) लगाया था।

कितनी हो सकती है सज़ा?
इस कानून के मुताबिक 'गैरकानूनी' गतिविधि की परिभाषा के मुताबिक 'भारत की संप्रभुता, अखंडता को नुकसान पहुंचाने वाली, नुकसान पहुंचाने का इरादा रखने वाली या नकारने वाली कोई भी गतिविधि' इस दायरे में में मानी जाएगी। ऐसी किसी गतिविधि के लिए इस कानून में 7 वर्ष तक की कैद का प्रावधान है। लेकिन, ऐसी किसी अवैध या आतंकवादी गतिविधि में कोई जान जाती है तो सज़ा की भी हो सकती है।