क्रेडिट मिला मनमोहन को, लाए थे रघुवंश बाबू

क्रेडिट मिला मनमोहन को, लाए थे रघुवंश बाबू

कभी मनरेगा। बाद में नरेगा। इस योजना को लेकर भारत में ही नहीं दुनिया भर में तरह तरह की बातें कहीं जाती हैं। वैश्विक संस्थानों ने तो इसे दुनिया भर में सर्वाधिक व सफलतापूर्वक रोज़गार देने वाली योजनाओं में से एक माना है। प्रधानमंत्री रहते हुए डॉ. मनमोहन सिंह की लोकप्रियता का यह बड़ा कारण रही है।

विश्लेषक तो यहाँ तक कहते हैं कि यही वह योजना थी जिसके चलते मनमोहन सिंह वर्ष 2009 में सत्ता में वापसी कर पाये थे। हालाँकि इस योजना को लेकर वैश्विक स्तर पर जो कहा जाता है, भारत और देश में नीचे के स्तर यानी ग्राउंड रियलिटी के स्तर पर इस योजना की बहुत तारीफ़ नहीं होती।

कहा जाता है इस योजना ने गाँव के लोगों को प्रधान का दुश्मन बना दिया। भ्रष्टाचार गाँव के स्तर तक पहुँचा दिया। लेकिन इस सच्चाई से मुँह नहीं मोड़ा जा सकता है कि इस योजना के चलते गाँव के स्तर पर लोगों की क्रय शक्ति बढी। प्रधान बोलेरो से चलने लगे। गाँव में शराब व मांस की खपत बढ़ी। गाँव में हर घर कम से कम दोपहिया तो हो ही गया।

पर इस योजना के जो वास्तुकार थे। उन्हें न नाम मिला। न दाम। जब यह योजना लागू की गयी थी तब राजग के नेता रहे रघुवंश प्रसाद सिंह देश के ग्रामीण विकास मंत्री थे।

एक परिचय
रघुवंश प्रसाद का जन्म छह जून को वैशाली के शाहपुर में हुआ था ।उन्होंने बिहार विश्वविद्यालय से मैथमेटिक्स में डॉक्टरेट उपाधि प्राप्त की हैं । युवावस्था में लोकनायक जयप्रकाश नारायण के आंदोलन से जुड़े । 1973 में संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के सचिव बने।

1977-90 तक बिहार सभा के सदस्य रहे। 1977-79 तक बिहार के ऊर्जा मंत्री रहे। लोक दल के अध्यक्ष बनाए गये। 1990 में बिहार विधानसभा के सहायक स्पीकर का पद संभाला । लोक सभा के सदस्य के रूप में उनका कार्यकाल 1996 से प्रारंभ होता है।

पहली बार निर्वाचित होते ही उन्होंने केंद्रीय पशुपालन एवं डेयरी उद्योग राज्यमंत्री बनाया गया । दूसरी बार 1998 में निर्वाचित हुए। तीसरी बार 1999 में लोकसभा के लिए चुने गये। चौथी बार 2004 में सांसद बने। 23 मई, 2004 से 2009 तक वह ग्रामीण विकास मंत्री रहे। 2009 में पाँचवीं बार जीते।

चर्चा ज्यां ट्रेज की
लेकिन एक बड़ा तबका बेल्जियम के नागरिक और बीते चालीस साल से भारत में साइकिल से घूम घूम कर स्लम में ज़िंदगी बिताने वाले् ज्यां ट्रेज को मनरेगा योजना का श्रेय देता हैं। उन्होंने भारत में रोज़गार, भूख व महिलाओं की स्थिति पर बहुत काम किया है।

उन्होंने अमर्त्य सेन के साथ मिलकर ‘हंगर एंड पब्लिक एक्शन’ नाम से किताब भी लिखी है। वह 1979 में पहली बार भारत आए । 1980 की गर्मियों में साइकिल से ही जयपुर, अजमेर, कोटा, भोपाल और सुदूर क्षेत्रों की यात्रा की।1983 में अपनी पीएचडी पूरी की। ज्यां को 2002 में भारत की नागरिकता मिल गयी।

ज्यां दिल्ली स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स में ऑनरेरी प्रोफेसर और रांची यूनिवर्सिटी में विजिटिंग प्रोफेसर हैं। ज्यां झुग्गी-बस्तियों में आम लोगों के साथ रहते हैं। तिमारपुर की झुग्गी बस्ती में अपनी जीवनसंगिनी बेला के साथ रहते हैं।

पिता है मशहूर अर्थशास्त्री
नरेगा की ड्राफ्टिंग करने के अलावा ज्यां “राइट टू फूड कैंपेन”, “सूचना का अधिकार”जैसे कई मुहिम में सक्रिय भूमिका निभा चुके हैं। पिता जेक्स द्रेज मशहूर अर्थशास्त्री हैं।अर्थशास्त्र-गणित और सांख्यिकी का अध्ययन करते हैं।

वह यूरोपियन इकोनॉमिक एसोसिएशन और इकोनॉमेट्रिक सोसायटी के प्रेसिडेंट रह चुके हैं।वह जरूरतमंद लोगों के लिए आर्थिक नीतियों पर काम करते हैं। मां फिजियोथैरेपिस्ट थीं। बेल्जियम में घर से सताई और घरेलू हिंसा की शिकार महिलाओं के लिए शेल्टर होम चलाती थीं।

असली हकदार रघुवंश बाबू
आज जब कोरोना काल में लाखों प्रवासी मजदूर मनरेगा के तहत काम कर के गुजारा कर रहे हैं। तब रघुवंश बाबू का नाम लेना ज़रूरी हो जाता है। क्योंकि मनरेगा योजना का श्रेय बिहार के नेता रघुवंश प्रसाद सिंह को ही जाता है। महात्मा गांधी ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना को लाने में उनका अहम योगदान था।

वर्ष 2004 के लोकसभा चुनाव में लालू प्रसाद की राष्ट्रीय जनता दल 22 सीटों पर जीत हासिल करने में कामयाब रही थी। यूपीए में कांग्रेस के बाद सबसे बड़ी पार्टी थी। इस लिहाज से उसके खाते में दो कैबिनेट मंत्रालय आए। पहला रेल मंत्रालय जिसका जिम्मा लालू प्रसाद यादव के पास था। दूसरा ग्रामीण विकास मंत्रालय जिसका जिम्मा रघुवंश प्रसाद सिंह के पास आया।

महत्वपूर्ण भूमिका
रघुवंश प्रसाद सिंह ने मनरेगा कानून को बनवाने और इसको पास करवाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। पी. चिदंबरम और प्रणब मुखर्जी इसे सरकार पर बोझ बढ़ाने वाला कह रहे थे ।उनको यह योजना पसंद नहीं थी।

ऐसे में रघुवंश प्रसाद सिंह को इस कानून के लिए मंत्रिमंडल के भीतर लंबी जिरह करनी पड़ी । कानून पास होने के बाद भी यह तकरार चलती रही।

मंत्रिमंडल के उनके कई सहयोगी चाहते थे कि शुरुआत में इसे सिर्फ 50 पिछड़े जिलों में लागू किया जाए। रघुवंश प्रसाद सिंह अड़े रहे। एक साल के भीतर इसे अमलीजामा पहनाने में कामयाब रहे।

सभी जिलों में लागू है योजना
2 फरवरी, 2006 को देश के 200 पिछड़े जिलों में महात्मा गांधी राष्ट्रीय रोजगार गारंटी योजना लागू की गई। 2008 तक यह भारत के सभी जिलों में लागू की जा चुकी थी।

2009 के चुनाव में कांग्रेस अपनी सत्ता बचाने में कामयाब रही। उस समय राजनीतिक विश्लेषकों ने इस जीत की दो बड़ी वजहें बताई थीं। पहला किसानों की कर्जा माफ़ी। दूसरा मनरेगा। लेकिन जिस योजना ने कांग्रेस की सत्ता में वापसी सुनिश्चित की उसका श्रेय रघुवंश प्रसाद को नहीं मिला।‘

‘एक्सीडेंटल प्राइममिनिस्टर’ में लेखक संजय बारू ने लिखा है,”कांग्रेस चाहती थी कि मनरेगा का पूरा क्रेडिट राहुल गांधी को दिया जाए। लेकिन असली हकदार मनमोहन सिंह और रघुवंश प्रसाद सिंह हैं।”

मनरेगा के सफल वर्ष
वर्ष 2007-08 के दौरान फरवरी 2008 तक कुल 3.10 करोड़ परिवारों ने रोजगार की माँग की थी ।.जबकि 3.08 करोड़ परिवारों को रोजगार प्रदान किया गया। इस दौरान कुल 121.64 करोड़ श्रम दिवस के रोजगार का सृजन किया गया।

इस दौरान केन्द्र की ओर से कुल 12,566.74 करोड़ रुपये जारी किये गये । जबकि राज्यों की ओर से कुल 1256.36 करोड़ रुपये दिये गये।

वर्ष 2013-14 में मनरेगा के तहत कार्यरत व्यक्तियों की संख्या 7.95 करोड़ थी जो कि वर्ष 2014-15 में घटकर 6.71 करोड़ रह गई। उसके बाद यह बढ़कर क्रमशः वर्ष 2015-16 में 7.21 करोड़, वर्ष 2016-17 में 7.65 करोड़ तथा वर्ष 2018-19 में 7.76 करोड़ हो गई।