उप्र के आनर किलिंग के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा...

उप्र के आनर किलिंग के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा...

जाति से जुड़ी हिंसा की घटनाओं के जारी रहने पर सुप्रीम कोर्ट ने चिंता जताई है। कहा है कि आजादी के 75 साल बीतने के बावजूद समाज में जाति के नाम पर हिंसा हो रही है। शीर्ष न्यायालय ने यह टिप्पणी उत्तर प्रदेश में 1991 में हुई आनर किलिंग की घटना पर फैसला सुनाते हुए की। घटना में में दो युवा पुरुषों और एक महिला को करीब 12 घंटे तक पीटा गया। इस पिटाई से उनकी मौत हो गई। यह घटना जातीय विद्वेष की भावना के चलते हुई। कोर्ट ने प्रशासन को इस तरह की घटनाओं को रोकने के लिए कड़े कदम उठाने के भी निर्देश दिए।

गवाहों की सुरक्षा को जरूरी बताया

जस्टिस एल नागेश्वर राव की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा, मामलों की सुनवाई सुचारु ढंग से चले और सत्य सामने आए, इसके लिए गवाहों की सुरक्षा जरूरी है। जब आरोपी पक्ष के साथ राजनीतिक लोग, बाहुबली और अमीर लोग हों तब गवाहों की सुरक्षा की जिम्मेदारी बढ़ जाती है। पीठ ने यह बात मामले में अभियोजन पक्ष के 12 गवाहों के पक्षद्रोही होने के चलते कही है। पीठ ने कहा, जातीय कट्टरता वाली गतिविधियां आज तक जारी हैं, जबकि संविधान सभी नागरिकों को बराबरी की दृष्टि से देखता है।

बरकरार रखा इलाहाबाद हाई कोर्ट का आदेश

पीठ ने समाज से जाति प्रथा खत्म करने के लिए भारत रत्न डा. भीमराव आंबेडकर के सुझाव को अमल में लाने का भी सुझाव दिया। कहा कि अंतरजातीय विवाहों को बढ़ावा देकर जातिविहीन समाज की स्थापना की जा सकती है। पीठ में जस्टिस संजीव खन्ना और जस्टिस बीआर गवई भी शामिल थे। मामले में ट्रायल कोर्ट ने नवंबर 2011 में दिए आदेश में 35 आरोपितों को दोषी ठहराकर उनके लिए सजा का एलान किया था, जबकि हाई कोर्ट ने इनमें से दो को बरी करते हुए बाकी की सजा को बरकरार रखा था।

हाई कोर्ट ने आठ दोषियों की मौत की सजा को आजीवन कारावास में तब्दील कर दिया था। जिन आठ लोगों को मौत की सजा से राहत दी गई थी, उन्हें आखिरी सांस तक जेल में ही रहना होगा। सुप्रीम कोर्ट ने तीन लोगों को पहचान स्पष्ट न हो पाने के चलते बरी कर दिया है, लेकिन इलाहाबाद हाई कोर्ट की बाकी मुजरिमों को दी गई सजा बरकरार रखी है।


क्या बिना मर्जी लगाया जा सकता है कोरोना का टीका? सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में दिया जवाब

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नई दिल्ली: केंद्र ने सुप्रीम कोर्ट से कहा है कि केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय की ओर से जारी कोविड-19 टीकाकरण दिशानिर्देशों में किसी व्यक्ति की सहमति के बिना उसका जबरन टीकाकरण कराने की बात नहीं की गई है। दिव्यांगजनों को टीकाकरण प्रमाणपत्र दिखाने से छूट देने के मामले पर केंद्र ने न्यायालय से कहा कि उसने ऐसी कोई मानक संचालन प्रक्रिया (एसओपी) जारी नहीं की है, जो किसी मकसद के लिए टीकाकरण प्रमाणपत्र साथ रखने को अनिवार्य बनाती हो।

केंद्र ने गैर सरकारी संगठन एवारा फाउंडेशन की एक याचिका के जवाब में दायर अपने हलफनामे में यह बात कही। याचिका में घर-घर जाकर प्राथमिकता के आधार पर दिव्यांगजनों का टीकाकरण किए जाने का अनुरोध किया गया है। हलफनामे में कहा गया है कि भारत सरकार और स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय की ओर से जारी दिशानिर्देश संबंधित व्यक्ति की सहमति प्राप्त किए बिना जबरन टीकाकरण की बात नहीं कहते। केंद्र ने कहा कि किसी भी व्यक्ति की मर्जी के बिना उसका टीकाकरण नहीं किया जा सकता।