भारत के लिए अच्छी खबर: अब देश में नहीं बढ़ रही जनसंख्या, लगातार नीचे गिर रही प्रजनन दर

भारत के लिए अच्छी खबर: अब देश में नहीं बढ़ रही जनसंख्या, लगातार नीचे गिर रही प्रजनन दर

जनसंख्या को लेकर अक्सर ये कहा जाता है कि ये एक दोधारी तलवार है और बढ़ती हुई जनसंख्या दुनिया का सबसे बड़ा विरोधाभास है। जनसंख्या कोई लैंप की रोशनी तो है नहीं कि उसकी फ्लेम रेगुलेटर को घुमा कर कम कर दें। ये सूरज की ताप के समान है जिसे कम नहीं किया जा सकता।  हिन्दुस्तान उन सबसे पहले मुल्कों में था जिसने सबसे पहले जनसंख्या और परिवार नियोजन के लिए नीतियां बनाई। एक और खास बात ये है कि वो हिन्दुस्तान ही है जहां शादी होती है तो सबसे शाश्वत सवाल कि खुशखबरी कब सुना रहे हो। लेकिन लगातार बढ़ती भारत की आबादी के लिए एक अच्छी खबर सामने आई है। देश की आबादी स्थिर हुई है और प्रजनन दर भी नीचे गिर रहा है।

केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय द्वारा जारी नवीनतम राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (एनएफएचएस) के अनुसार देश की कुल प्रजनन दर (टीएफआर) या एक महिला द्वारा अपने जीवनकाल में बच्चों को जन्म देने की औसत संख्या 2.2 से घटकर 2 हो गई है, जबकि कन्ट्रासेप्टिव प्रिवलेंस रेट (सीपीआर) में भी वृद्धि हुई हैं और यह 54% से बढ़कर 67% तक हो गई है। यानी सरल भाषा में कहें तो देश की महिला अपने जीवन में 2 बच्चों को ही जन्म दे रही हैं। इसका सीधा सा मतलब है कि देश की जनसंख्या अब स्थिर हो गई। सर्वे के दूसरे चरण में अरुणाचल प्रदेश, चंडीगढ़, छत्तीसगढ़, हरियाणा, झारखंड, मध्य प्रदेश, राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली, ओडिशा, पुड्डुचेरी, पंजाब, राजस्थान, तमिलनाडु, उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड का सर्वेक्षण किया गया। मध्य प्रदेश, राजस्थान, झारखंड, उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश को छोड़कर सर्वे में शामिल अन्य राज्यों ने प्रतिस्थापन स्तर हासिल कर लिया है।

संयुक्त राष्ट्र के जनसंख्या विभाजन के अनुसार, कम-प्रतिस्थापन प्रजनन क्षमता का अनुभव करने वाले देश - प्रति महिला 2.1 से कम बच्चे - इंगित करते हैं कि एक पीढ़ी खुद को बदलने के लिए पर्याप्त बच्चे पैदा नहीं कर रही है, जिससे अंततः जनसंख्या में एकमुश्त कमी आई है। सर्वेक्षण श्रृंखला में पांचवें एनएफएचएस 2019-21 के आंकड़े शहरी क्षेत्रों में प्रजनन दर 1.6 प्रतिशत और ग्रामीण भारत में 2.1 प्रतिशत दर्शा रहे हैं। सर्वे से यह भी पता चलता है कि परिवार नियोजन की अधूरी जरूरतें 13% से घटकर 9 फीसदी हो गई हैं। झारखंड (12%), अरुणाचल प्रदेश (13%) और उत्तर प्रदेश (13%) को छोड़कर सभी राज्यों में स्पेसिंग जो देश में अभी भी एक प्रमुख मुद्दा बना हुआ है, 10 फीसदी से भी कम हो गई है।


EWS कोटा के लिए आय सीमा की होगी समीक्षा, SC की फटकार के बाद केंद्र ने बनाया तीन सदस्यीय पैनल

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केंद्र सरकार ने आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के लोगों के लिए आरक्षण यानी ईडब्लूएस कोटा के मानदंडों की समीक्षा करने का फैसला किया है। सुप्रीम कोर्ट से फटकार लगने के बाद मंगलवार को सामाजिक न्याय एवं सशक्तीकरण मंत्रालय ने आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग को मिलने वाले 10 फीसदी कोटा के मानदंडों के लिए समीक्षा के लिए तीन सदस्यीय समिति का गठन किया है। समिति में पूर्व वित्त सचिव अजय भूषण पांडे, इंडियन काउंसिल ऑफ सोशल साइंस रिसर्च के सदस्य वी.के. मल्होत्रा और भारत सरकार के प्रिंसिपल इकोनॉमिक एडवाइजर संजीव सान्याल शामिल हैं। समिति को अपना काम पूरा करने के लिए तीन हफ्तों का समय दिया गया है।

बता दें कि आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग को आरक्षण के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को “उच्च-स्तरीय नीति पर पुनर्विचार” करने का सुझाव दिया था। मामले में सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने सख्त टिप्पणी दी थी और कहा था कि केंद्र सार्वजनिक रूप से 10% कोटा प्रदान करने के लिए आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग  की पहचान करने के लिए हवा में 8 लाख रुपए की वार्षिक आय सीमा नहीं निकाल सकता। 

कोर्ट ने केंद्र की तरफ से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल एएम नटराजन से कहा था कि आपके पास कुछ जनसांख्यिकीय या सामाजिक या सामाजिक आर्थिक डेटा होना चाहिए. आपने क्या किया है वो हमें बताएं। केंद्र से सुप्रीम कोर्ट ने 8 लाख की सीमा तय करने के आधार को स्पष्ट करने के लिए एक सप्ताह के भीतर केंद्र से हलफनामा मांगा है। कोर्ट ने कहा कि जब पहले से संवैधानिक तौर पर दिया गया 49 फीसदी कोटा अनुसूचित जाति (एससी), अनुसूचित जनजाति (एसटी) और अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) के लिए है तो ऐसे में 10 फीसदी ईडब्ल्यूएस कोटा देने से 50 फीसदी आरक्षण का नियम भंग हो सकता है।

बता दें कि उच्चतम न्यायालय छात्रों की याचिकाओं पर सुनवाई कर रहा है जिसमें मौजूदा अकादमिक वर्ष के लिए राष्ट्रीय पात्रता सह प्रवेश परीक्षा (नीट-पीजी) में चिकित्सा पाठ्यक्रमों के लिए दाखिले में अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) के लिए 27 प्रतिशत आरक्षण और ईडब्ल्यूएस के लिए 10 प्रतिशत आरक्षण उपलब्ध कराने के लिए केंद्र तथा मेडिकल काउंसिलिंग कमिटी के 29 जुलाई के नोटिस को चुनौती दी गई है।