कैग : नहीं बनाया वायु प्रदूषण नियंत्रण का प्लान, पढ़े पूरी खबर

कैग : नहीं बनाया वायु प्रदूषण नियंत्रण का प्लान, पढ़े पूरी खबर

अर्द्ध कुंभ मेला 2016 के दौरान यातायात व्यवस्थित करने के लिए एक स्टील पुल बनाने की योजना में 1.69 करोड़ रुपये की वित्तीय अनियमितता उजागर हुई है. ये मुद्दा लोक निर्माण विभाग के प्रांतीय खंड का है. कैग की रिपोर्ट के अनुसार, प्रस्तावित योजना में परिवर्तन के चलते सेतु निर्माण के लिए स्टील की आवश्यक मात्रा 266 मीट्रिक टन से घटकर 73.31 मीट्रिक टन हो गई थी.

खास बातें

  • ठेकेदार को करना पड़ा 1.69 करोड़ का भुगतान
  • पर्यावरण संरक्षण एवं प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड पर उठाए सवाल
  • करार तोड़ ड्यूटी से नदारद डॉक्टरों से नहीं वसूले 18 करोड़
  • वाणिज्य कर विभाग ने कम दर से वसूला टैक्स, 51.71 लाख का राजस्व नुकसान
  • स्टोन क्रशर मालिकों पर मेहरबानी, नहीं वसूला 1.86 करोड़ का शुल्क 
  • लाभार्थियों को दिया ऋण वसूल नहीं कर पाया बहुउद्देशीय वित्त एवं विकास निगम

स्टील की शेष मात्रा 192.69 मीट्र्कि टन ठेकेदार के पास पड़ी थी, जिसका उपयोग बैरागी कैंप से गौरीशंकर द्वीप सेतु के निर्माण में किया जा सकता था. लेकिन इसका प्रयोग करने के जगह पर विभाग ने पुन: 518.45 मीट्रिक टन स्टील की खरीद व निर्माण करने की अनुमति दे दी. इस तरह 192.69 मीट्रिक टन बचा हुआ स्टील का उपयोग नहीं किया जा सका. इसके चलते ठेकेदार को 1.69 करोड़ रुपये का भुगतान करना पड़ा.

कैग ने कहा, नहीं बनाया वायु प्रदूषण नियंत्रण का प्लान 

कैग ने उत्तराखंड पर्यावरण संरक्षण एवं पर्यावरण नियंत्रण बोर्ड की कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठाया है. लेखा इम्तिहान में कैग ने पाया कि बोर्ड ने प्रदेश में वायु प्रदूषण नियंत्रण के लिए कोई व्यापक प्रोग्राम नहीं बनाया. वायु प्रदूषण के 12 मानक अधिसूचित किए गए हैं. इनमें से सभी की निगरानी की व्यवस्था बोर्ड ने नहीं की. बोर्ड ने सहमति व्यवस्था के तहत उद्योग विभाग से समन्वय कर दर्ज़ उद्योगों की जानकारी हासिल नहीं की. परिवहन विभाग ने 15 वर्ष पुराने वाहनों के फिर से पंजीकरण के लिए तरीका नहीं किया.

ईंट भट्टों व खनन इकाइयों से वायुमंडल में फैलने वाले प्रदूषण की रोकथाम व नियंत्रण पर भी कार्य करने में बोर्ड पास साबित नहीं हुआ. काम की वार्षिक रिपोर्ट तैयार करने व उसे विधानसभा के पटल पर रखने में भी बोर्ड असफल रहा. कैग ने यह भी पाया कि पेट्रोल व डीजल पंपों के निकट बेंजीन स्तर को मापने की भी बोर्ड ने कोई व्यवस्था नहीं की.

देहरादून में ही वायु गुणवत्ता के हिसाब से गुणवत्ता को नियंत्रित करने के लिए उद्योगों का सर्वे भी बोर्ड ने नहीं कराया. पूछे जाने पर बोर्ड ने बोला कि स्टाफ की कमी की वजह से सर्वे नहीं कराया जा सका. 2015 से लेकर 2018 के बीच बोर्ड के पास 56 से लेकर 65 फीसदी तक का फंड सरप्लस रहा.

स्वास्थ्य विभाग ने बांड का उल्लंघन करने वालों पर नहीं की कार्रवाई

करार तोड़कर प्रदेश के दूरस्थ क्षेत्रों में ड्यूटी से नदारद डॉक्टरों से 18 करोड़ की वसूली नहीं हो पाई. बांड का उल्लंघन करने वाले 60 डॉक्टरों के विरूद्ध वसूली की कार्रवाई करने में स्वास्थ्य विभाग हीलाहवाली करता रहा. इससे प्रदेश के दूरस्थ क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत करने का उद्देश्य विफल रहा. कैग की रिपोर्ट में इसका खुलासा हुआ है. 

प्रदेश सरकार ने पहाड़ों में डॉक्टरों की उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए साल 2008 से 2012 तक उत्तराखंड प्री-मेडिकल टेस्ट (यूपीएमटी) के माध्यम से एमबीबीएस कोर्स में प्रवेश के लिए चयनित विद्यार्थियों के बांड का प्रावधान किया था. जिसमें एमबीबीएस की पढ़ाई के लिए बांड भरने वाले विद्यार्थी को रियायती दरों पर प्रति साल 15 हजार रुपये देने थे. जबकि शेष राशि का भुगतान प्रदेश सरकार की ओर से किया गया. बांड धारक विद्यार्थी से शपथ लेटर लिया गया कि एमबीबीएस कोर्स पूरा करने के बाद पांच वर्ष तक अनुबंध के आधार पर दुर्गम इलाकों में जरूरी रूप से सेवाएं देंगे.

ऐसा न करने पर वे 30 लाख का भुगतान करने के लिए उत्तरदायी होंगे. साल 2008 और 2009 के बैच में 200 एमबीबीएस विद्यार्थियों ने बांड के माध्यम से एमबीबीएस कोर्स किया. इसमें 180 विद्यार्थियों को स्वास्थ्य महानिदेशक की ओर से दूरस्थ क्षेत्रों में डॉक्टरों के रूप में नियुक्त किया. कैग की रिपोर्ट के अनुसार 60 डॉक्टरों ने शपथ लेटर व बांड की शर्तों का उल्लंघन किया. ज्वाइनिंग करने के बाद कुछ समय तक सेवाएं देने के बाद ड्यूटी से गायब हो गए थे. इन डॉक्टरों से 18 करोड़ रुपये की वसूली की जानी थी. लेकिन स्वास्थ्य विभाग की उदासीनता के कारण करार तोड़ने वाले डॉक्टरों से वसूली नहीं हो पाई है. 

सरकार को 51.71 लाख का राजस्व नुकसान

वाणिज्य कर विभाग ने मूल्य वर्धित कर अधिनियम (वैट) में निर्धारित दर के अनुसार व्यापारियों से कर की वसूली न करने से सरकार को 51.71 लाख रुपये के राजस्व का नुकसान पहुंचाया. वहीं, विभाग ने टीडीएस देरी से जमा करने पर व्यवसायी से 0.59 करोड़ के अर्थदंड व ब्याज की वसूली नहीं की. कैग रिपोर्ट में विभागीय अधिकारियों की लापरवाही उजागर हुई है.

वैट प्रणाली में ट्रेड रबर (टायर एवं ट्यूब की रिट्रेडिंग के लिए इस्तेमाल होना वाला) पर 13.5 फीसदी कर निर्धारित है. कैग ने साल 2017-18 के दौरान 72 कर अभिलेखों की जाँच की. जिसमें पाया गया कि साल 2012-13 से 2014-15 के कर निर्धारण में चार व्यापारियों के पांच मामलों में निर्धारित कर दर की स्थान पांच और साढ़े चार फीसदी के हिसाब से कर वसूला गया. इन मामलों में विभाग ने 26.12 लाख रुपये का कम कर वसूल किया. इसी तरह एलईडी बल्ब, एलईडी ट्यूब व पैनल्स पर पांच फीसदी की दर से कर वसूला गया है.

जबकि इन उत्पादों पर वर्गीकृत वस्तुओं की बिक्री की भांति 13.5 फीसदी की दर से कर लिया जाना चाहिए. 8.5 फीसदी से कम दर से कर वसूलने से 25.59 लाख रुपये का नुकसान हुआ है. वहीं, चावल के आटे की बिक्री पर 13.5 फीसदी की दर कर वसूलने की स्थान विभागीय अधिकारियों ने कर मुक्त बिक्री मान लिया. इससे 8.59 लाख रुपये कम कर प्राप्त हुआ है.

स्टोन क्रशर मालिकों पर खनन विभाग ने मेहरबानी दिखाई है. जून 2017 से मार्च 2018 के बीच खनन विभाग ने 26 स्टोन क्रशर मालिकों से विनियमितीकरण व पंजीकरण शुल्क नहीं वसूला. इससे सरकार को 1.86 करोड़ रुपये के राजस्व की हानि हुई है. कैग रिपोर्ट में इसका खुलासा हुआ है. वहीं, विभाग ने रायल्टी की गणना गलत दर से करके 32.74 लाख की रायल्टी कम वसूली है. 

प्रदेश सरकार ने पर्यावरण संरक्षण व गैरकानूनी खनन को रोकने के लिए साल 2016 में स्टोन क्रशरों के लिए नयी लाइसेंस नीति लागू की थी. इस नीति के अनुसार पूर्व में स्थापित स्टोन क्रशर मालिकों को नीति की अधिसूचना जारी होने के 15 दिन के अंदर प्लांट की क्षमता को घोषित करना था. नीति में मैदानी क्षेत्रों में 100 टन क्षमता के क्रशर के लिए आवेदन शुल्क 10 लाख व पर्वतीय क्षेत्रों में पांच लाख रुपये निर्धारित है. साल 2017-18 के दौरान कैग ने 171 स्टोन क्रशर इकाईयों के दस्तावेजों की जाँच की.

हरिद्वार, देहरादून, हल्द्वानी (नैनीताल) व पौड़ी जिले की जाँच में पाया गया कि 26 स्टोन क्रशर मालिकों से 1.21 करोड़ का विनियमितीकरण शुल्क व 0.65 करोड़ वार्षिक नवीनीकरण शुल्क नहीं वसूला गया. वहीं, हरिद्वार में दो व पौड़ी में एक भंडारकर्ता से खनिज भंडारण के लिए निर्धारित शुल्क की वसूली न करने से 3.17 करोड़ के राजस्व का नुकसान हुआ है. विभाग ने खनन पट्टों पर रिवर ट्रेनिंग, विकास शुल्क, क्षतिपूर्ति शुल्क से प्राप्त 59.68 लाख रुपये की धनराशि जिला खनिज फाउंडेशन में कम जमा किया है. इस रािश को खनन प्रभावित क्षेत्रों के विकास कार्यों पर खर्च किया जाता है.


सामाजिक कल्याण योजनाओं में वितरित किया 12.94 करोड़ ऋण

प्रदेश सरकार की विभिन्न सामाजिक कल्याणकारी योजनाओं में लाभार्थियों को ऋण में दिए गए 12.94 करोड़ की वसूली नहीं हो पाई है. उत्तराखंड बहुउद्देशीय वित्त एवं विकास निगम ने अलावा ब्याज से बचने के लिए अपने संसाधनों से राष्ट्रीय स्तर के निगमों को 8.29 करोड़ का भुगतान कर दिया. लेकिन लाभार्थियों को दिए गए ऋण की वसूली नहीं कर पाया. वहीं, अनुचित वित्त प्रबंधन के कारण निगम ने 1.14 करोड़ का अलावा ब्याज अर्जित करने का मौका गंवाया है.

कैग की रिपोर्ट के अनुसार योजनाओं को संचालित करने के लिए सरकार ने वित्त एवं विकास निगम को ऋण उपलब्ध कराने के लिए राष्ट्रीय निगमों को गारंटी दी थी. निगम के माध्यम से 2001-02 से लेकर 2016-17 तक 23.27 करोड़ का उधार लिया गया. जिसमें सभी जिलों में लाभार्थियों को 18.47 करोड़ का ऋण वितरित किया गया. कुल 1383 डिफाल्टर लाभार्थियों में 313 के विरूद्ध रिकवरी सर्टिफिकेट जारी की गई.