फांसी देने के लिए क्यों बिहार के बक्सर से एक खास तरह की रस्सी मंगाई जाती है, जाने क्या है वजह

फांसी देने के लिए क्यों बिहार के बक्सर से एक खास तरह की रस्सी मंगाई जाती है, जाने क्या है वजह

सारे देश को निर्भया के दोषियों को फांसी देने का इंतज़ार है। दोषी विनय शर्मा की दया याचिका पर कभी भी राष्ट्रपति निर्णय ले सकते हैं। निर्णय के 14 दिनों के अंदर देनी होती फांसी देनी होती है लेकिन क्या आपको पता है कि फांसी देने के लिए क्यों बिहार के बक्सर से एक खास तरह की रस्सी मंगाई जाती है ?

जवाब जान कर आप भी दंग रह जाएंगे कि हमारे देश मे मरने वाले इंसान को ज्यादा तकलीफ ना हो उसका भी ख्याल रखा जाता है। क्योंकि गंगा किनारे बसे बिहार के जिले बक्सर की रस्सी को जिन रेशों से बनाया जाता है वो बेहद मुलायम व मजबूत होते हैं। रस्सी को बनाने के बाद बहुत ज्यादा देर तक वैक्स में डूबा कर रखा जाता है जिसकी वजह से फांसी देते वक्त बाकी रस्सियों के मुकाबले बक्सर की रस्सी से फांसी देने वाले कैदी को तकलीफ कम होती है।

तिहाड़ कारागार प्रशासन ने बक्सर कारागार को 10 रस्सियों का ऑर्डर दे दिया है। फांसी देने वाले तख्त व सेल की सफाई करवाई गई है। कारागार मैनुअल के मुताबिक हर तीन महीनों में फांसी देने वाली स्थान पर ड्राई रन किया जाता है जहां एक डमी कैदी को लटका कर देखा जाता है कि फांसी देने का पूरा सिस्टम अच्छा से कार्य कर रहा है या नहीं। ड्राई रन के दौरान जिस कैदी को सज़ा देनी होती है उसके वज़न से डेढ़ गुना ज्यादा वजन को लटकाया जाता है, इस ड्राई रन को करने के पीछे रस्सी के वजन उठाने की क्षमता को भी चेक करना होता है कि रस्सी फांसी देते वक्त टूट तो नहीं जाएगी।

क्या होती है फांसी देने की प्रक्रिया ?
राष्ट्रपति से दया याचिका खारिज़ होने के 14 दिन के अंदर फांसी देनी होती है। राष्ट्रपति का निर्णय जैसे ही निचली न्यायालय को मिलता है तो न्यायालय फांसी देने के लिए ब्लैक वारंट जारी करती है जिसमें फांसी देने की तारीख व समय दिया होता है। उस ब्लैक वारंट की एक कॉपी कैदी को भी दी जाती है। जिसके बाद उसे परिवार वालो से मिलने भी दिया जाता है।

ब्लैक वारंट जारी होने के बाद कैदी को एक अलग कंडम सेल में रखा जाता है। उस पर फांसी पर लटकाए जाने तक हर वक़्त नज़र रखी जाती है। उसको बाकी कैदियों से दूर रखा जाता है। फांसी वाले दिन उसे प्रातः काल साढ़े 4 बजे जगा कर नहलाया जाता है चाय व नास्ता दिया जाता है, उसका मेडिकल होता है, फिर काले कपड़े पहनाकर फांसी के तख्ते पर लाया जाता है।

फांसी देते वक्त उस स्थान जल्लाद के अतिरिक्त सिर्फ चार लोग उपस्थित होते है। जिसमे उस कारागार का सुपरिटेंडेंट, एसडीएम, व दो चिकित्सा ऑफिसर होते हैं।