गलवान के शहीद की याद में घरवालों ने बनाया कुछ खास

गलवान के शहीद की याद में घरवालों ने बनाया कुछ खास

 
गलवान घाटी में चीनी सेना से लोहा लेते शहीद हुए झारखंड के बहरागोड़ा निवासी गणेश हांसदा की याद में उनके घर के लोगों ने साढ़े बाईस लाख रुपये खर्च कर खूबसूरत स्मृति पार्क और विद्यालय का निर्माण कराया है. पूर्वी सिंहभूम जिला भीतर बहरागोड़ा के कोसाफलिया गांव में बनाया गया यह पार्क उनकी वीरगति की दूसरी बरसी पर बीते 16 जून को आम लोगों के लिए खोल दिया गया है.

पार्क का निर्माण गणेश हांसदा की वीरगति पर गवर्नमेंट और सेना से मिली राशि से किया गया है. इतना ही नहीं, गांव में पेयजल की परेशानी को दूर करने के लिए शहीद का परिवार 20 हजार लीटर की क्षमता वाले पानी टंकी का भी निर्माण करा रहा है.

शहीद गणेश हांसदा के भाई दिनेश हांसदा कहते हैं, मेरे भाई की चाहत थी कि गांव में हर तरह की महत्वपूर्ण सुविधाएं उपस्थित हों. गांव के बच्चे पढ़े-लिखें और उनका भविष्य बेहतर हो. वह स्वयं पढ़ाई में बचपन से बहुत होशियार था. मैट्रिक प्रथम श्रेणी में पास करने के बाद इंटर की पढ़ाई के दौरान ही वह सेना में भर्ती हो गया था. दो वर्ष तक सेना की सेवा करते हुए उसने सरहद पर वीरगति दे दी. उनके सपनों को गांव की धरती पर उतारने के लिए जितना कुछ बन सकेगा, हम जरूर करेंगे.

मात्र 23 साल की उम्र में शहीद हुए गणेश हांसदा के पिता सुबदा हांसदा किसान और मां गृहणी हैं. बड़े भाई दिनेश हांसदा गांव में ही रहकर खेती-बाड़ी करते हैं. दिनेश बताते हैं हमलोग उसकी विवाह की तैयारी कर रहे थे. मां ने उसके लिए लड़की भी देखी थी. हम सभी को खुशी के इस मौके का इन्तजार था, लेकिन 16 जून 2020 को गलवान घाटी से उसकी वीरगति की समाचार आयी तो हमारे पांवों के नीचे की जमीन खिसक गयी.

शहादत के तीन दिन बाद जब गणेश हांसदा ताबूत में तिरंगे में लिपटकर आये थे तो उनके आखिरी दर्शन के लिए हजारों लोग उमड़ पड़े थे. उसी रोज उनके घर के लोगों ने संकल्प लिया था कि गांव की माटी में शहीद बेटे की स्मृति में अमर निशानी बनाये थे. वीरगति के ठीक दो वर्ष बाद जिस क्षण पार्क में उनकी प्रतिमा का अनावरण हुआ, तब मां-पिता, भाई सबकी आंखें नम हो उठीं.

गांव में बनाया गया स्मृति पार्क बहुत खूबसूरत है. यहां शहीद गणेश हांसदा के साथ-साथ हिंदुस्तान माता की प्रतिमा, शहीद वेदी और अमर जवान ज्योति का प्रतीक भी बनाया गया है. एक छोटा सा म्यूजियम भी बनाया गया है, जहां लोगों को जवानों की वीरगति की स्मृतियों को प्रदर्शित किया जायेगा.

इस पार्क का लोकार्पण बीते 16 जून को कैबिनेट मंत्री चंपई सोरेन के हाथों हुआ. इसके बाद से हर रोज बड़ी संख्या में लोग स्मृति पार्क पहुंच रहे हैं. पार्क की हरियाली, यहां लगाये गये तरह-तरह फूल और खूबसूरत सज्जा लोगों को खूब लुभा रही है. घरवालों को इस बात का दुख है कि सीएम हेमंत सोरेन ने पार्क के लोकार्पण कार्यक्रम में आने का वादा किया था, लेकिन वह नहीं आये. कार्यक्रम के दिन उन्होंने ऑफिसरों और मंत्री के समक्ष इसपर नाराजगी का इजहार भी किया.

दरअसल, शहीद का परिवार राज्य गवर्नमेंट की ओर से किए गये वादे अब तक पूरे न होने से भी आहत है. राज्य गवर्नमेंट की ओर से शहीद के परिजनों को उनकी पसंद के जगह पर नि:शुल्क भूखण्ड देने और पेट्रोल पंप दिलाने के लिए केंद्र गवर्नमेंट से अनुशंसा का वादा किया गया था. ये वादे आज तक पूरे नहीं हुए.






भारत के आखिरी रेलवे स्टेशन को देख क्या बोलेंगे आप

भारत के आखिरी रेलवे स्टेशन को देख क्या बोलेंगे आप

Indias Last Railway Station: भारत का रेल इंफ्रास्ट्रक्चर अंग्रेजों के जमाने का है यहां आज भी कुछ नियम ऐसे हैं जो लंबे समय से चले आ रहे हैं ऐसे में ही यह रेलवे स्टेशन भी सबसे अनोखा है इसका नाम है सिंहाबाद रेलवे स्टेशन (Singhabad Railway Station), जो कि हिंदुस्तान का अंतिम रेलवे स्टेशन भी है 

आज भी अंग्रेजों के टाइम जैसा है ये स्टेशन

इस रेलवे स्टेशन की विशेषता यह है कि यह आज भी वैसा ही है, जैसा अंग्रेज छोड़कर गए थे यहां स्टेशन में हर चीज टिकट से लेकर गियर और रेलवे बैरियर तक अंग्रेजों के जमाने के हैं यहां पिछले कई वर्षों से कोई यात्री ट्रेन नहीं रुकती ये पश्चिम बंगाल के मालदा जिले के हबीबपुर क्षेत्र में है सिंहाबाद से लोग पैदल भी कुछ किलोमीटर दूर बांग्लादेश में घूमते हुए चले जाते हैं इसके बाद हिंदुस्तान का कोई और रेलवे स्टेशन नहीं है ये बहुत छोटा स्टेशन है जहां कोई चहल पहल और भीड़भाड़ नहीं दिखती 

मालगाड़ियों के लिए होता है इस्तेमाल 

आपको बता दें कि इस रेलवे स्टेशन का उपयोग मालगाडियों के ट्रांजिट के लिए किया जाता है सिंहाबाद स्टेशन के नाम पर छोटा सा स्टेशन ऑफिस दिखता है, इसके पास एक-दो रेलवे के क्वॉर्टर हैं इस स्टेशन पर कर्मचारी भी नाम मात्र के ही हैं यहां के रेलवे बोर्डों में इसके नाम के साथ लिखा है- हिंदुस्तान का आखिरी स्टेशन

1978 में इस रूट पर प्रारम्भ हुईं मालगाड़ियां

गौरतलब है कि वर्ष 1971 की लड़ाई के बाद जब बांग्लादेश बना तो भारत- बांग्लादेश के बीच यातायात प्रारम्भ करने की मांग फिर जोर पकड़ने लगी 1978 में हिंदुस्तान और बांग्लादेश में एक समझौता हुआ, जिससे इस रुट पर माल गाड़ियां चलने लगीं ये हिंदुस्तान से बांग्लादेश आती और जाती थीं नवंबर 2011 में पुराने समझौते में संशोधन किया गया अब समझौते में नेपाल को भी शामिल कर लिया गया है यानी सिंहाबाद होकर नेपाल की ओर जाने वाली मालगाड़ियां भी चलने लगीं

नेपाल की ट्रेनें भी यहीं से गुजरती हैं

2011 के बाद से यहां से केवल बांग्लादेश ही नहीं बल्कि नेपाल की ओर जाने वाली ट्रेनें भी गुजरने लगीं गौरतलब है कि बांग्लादेश से नेपाल को काफी बड़े पैमाने पर खाद निर्यात होता है इन्हें लेकर जाने वाली मालगाड़ियों की खेप रोहनपुर-सिंहाबाद ट्रांजिट प्वॉइंट से निकलती है 

गांधी और सुभाष चंद बोस ने भी किया इस रूट का इस्तेमाल

ये स्टेशन कोलकाता से ढाका के बीच ट्रेन संपर्क के लिए उपयोग होता था वैसे यह स्टेशन आजादी से पहले का है, इसलिए इस रूट का उपयोग कई बार महात्मा गांधी और सुभाष चंद बोस ने ढाका जाने के लिए भी किया