अक्सर हमारे भाग्य को चमकाती है ये खानपान की चीजें

अक्सर हमारे भाग्य को चमकाती है ये खानपान की चीजें

आज भी इंसान अपने आप से डरता है उसे विश्वास नहीं होता क्या वह सही कर रहा है। इसलिए वह अन्धविश्वास का सहारा लेता है। अंधविश्वासी विश्वास अक्सर किसी देश के सांस्कृतिक माहौल से जुड़ा हुआ है। कुछ अंधविश्वास सकारात्मक हैं जो आपके आत्मविश्वास को बढ़ा सकते हैं या अच्छे भाग्य ला सकते हैं जबकि कुछ नकारात्मक काम कर सकते हैं। 

ये है कुछ दिलचस्प अंधविश्वास:

नीबू: यदि आप नीबू और मिर्च को एक साथ बांधते हैं तो बुरी नजरें दूर रहेंगी। भारत में, लोग आमतौर पर दुकानों, कार्यस्थलों और यहां तक कि घर के दरवाजे पर इसे टांग दिया करते हैं।

दही और चीनी: चीनी और दही के संयोजन को एक अच्छा शकुन माना जाता है और आमतौर पर लोगों को इसे छोटी-मोटी या लंबी यात्राओं, परीक्षा के समय, साक्षात्कार में जाने से पहले इसे खाते हैं।

नमक: ऐसा माना जाता है कि अगर नमक गलती से भी नीचे गिर जाए तो वह दुर्भाग्य ला सकता है। इसे फेंकने से पहले पानी से बाहर घोलना चाहिए। 

तेल: भारतीय संस्कृति के मुताबिक, लंबी यात्रा के दौरान तेल या अचार ले जाना अपशकुन वाला काम है। इसलिए इस संयोजन को यात्रा के दौरान ले जाने से बचना चाहिए।

घी: हिंदू धर्म में घी को पवित्र माना जाता है।इसका उपयोग दीपक को जलाने में किया जाता है ताकि घर की नकारात्मक ऊर्जा को दूर किया जा सके और सकारात्मकता और खुशी लाई जा सके।

मिर्च: भारतीय मान्यतानुसार, मिर्च प्रभावित व्यक्ति से बुरी नजर को मिटा सकती है। आप इससे साथ असहमत हो सकते हैं, लेकिन यह अभ्यास दुनिया भर में कई धर्मों और समुदायों द्वारा किया जाता है।


बच्चे की कमजोर नजर का घर बैठे लगा सकेंगे पता, बस स्मार्ट फोन से लेनी होगी आंखों की तस्वीर

बच्चे की कमजोर नजर का घर बैठे लगा सकेंगे पता, बस स्मार्ट फोन से लेनी होगी आंखों की तस्वीर

अब नजर कमजोर होने पर बच्चों अस्पताल तक दौड़ लगाने की जरूरत नहीं पड़ेगी। स्मार्ट फोन से आंखों की तस्वीर लेकर भी डॉक्टर आंखों की नजर संबंधी बीमारी का पता लगा सकेंगे। स्मार्ट फोन से आंखों की खींची गई फोटो कितनी कारगर है, इस पर केजीएमयू ने शोध शुरू किया है। शुरुआती जांच में करीब 20 फीसदी स्कूली बच्चों को आंखों से संबंधी परेशानी का पता चला है।

केजीएमयू नेत्र रोग विभाग काउंसिल ऑफ सांइस एंड टेक्नोलॉजी के प्रोजेक्ट के तहत शोध कर रहा है। स्मार्ट फोन फोटोग्राफी फॉर स्क्रीनिंग अक्यूलर मार्बिटी इन स्कूल चिल्ड्रन के नाम से प्रोजेक्ट शुरू हुआ है। अब तक प्रोजेक्ट के तहत लखनऊ के 50 सरकारी स्कूल के करीब 2500 बच्चों की आंखों की जांच की जा चुकी है। कक्षा तीन से आठ तक के छात्र-छात्राओं को शोध में शामिल किया गया है। इनकी उम्र छह से 12 साल है।

इलाज में देरी घातक
नेत्र रोग विभाग के डॉ. सिद्धार्थ अग्रवाल के मुताबिक कई बार छोटे बच्चे अक्षरों को पहचान नहीं पाते हैं। ऐसे में बीमारी की पहचान कठिन हो जाती है। नतीजतन समय पर नजर संबंधी बीमारी का पता नहीं चल पाता है। देरी से मर्ज की पहचान आंखों की सेहत के लिए घातक है। इससे बीमारी के गंभीर होने का खतरा बना रहता है।