World Radio Day : पहली बार ली द फोरेस्ट ने न्यूयॉर्क में प्रारम्भ किया संसार का पहला रेडियो स्टेशन

World Radio Day : पहली बार ली द फोरेस्ट ने न्यूयॉर्क में प्रारम्भ किया संसार का पहला रेडियो स्टेशन

आज वर्ल्ड रेडियो डे (World Radio Day) है। 13 फरवरी को पूरी संसार में रेडियो का महत्व बताने व इसको लेकर जागरुकता फैलाने के लिए हर वर्ष रेडियो डे मनाया जाता है। आज के वक्त में जब संसार टीवी से निकलकर कंप्यूटर व मोबाइल जैसी हाईफाई टेक्नोलॉजी तक पहुंच चुकी है, रेडियो का महत्व कम नहीं हुआ है।

एक वक्त ऐसा भी आया था, जब टीवी के आने से ऐसा लगा था कि रेडियो के दिन समाप्त हो जाएंगे। लेकिन टीवी के बाद भी संसार कितनी बदल गई, रेडियो की रौनक अब भी बनी हुई है।

1918 में पहली बार ली द फोरेस्ट ने न्यूयॉर्क के हाईब्रिज इलाके में संसार का पहला रेडियो स्टेशन प्रारम्भ किया। आरंभ में इसे पुलिस की पाबंदी झेलनी पड़ी व इसके सिर्फ सरकारी प्रयोग को मंजूरी दी गई। बाद में प्राइवेट तौर पर भी रेडियो सेवा प्रारम्भ हुई।

जब हिंदुस्तान में पहली बार आया रेडियो

भारत में रेडियो 1924 में आया। इसे लाने वाला था मद्रास प्रेसिडेंट क्लब। 3 वर्ष तक इसमें कार्य किया गया, फिर 1927 में आर्थिक मुश्किलों के चलते इसे बंद कर दिया गया। इसी वर्ष बॉम्बे के व्यापारियों ने एक बार फिर बॉम्बे व कोलकाता में रेडियो स्टेशन बनवाए। 1930 तक इसमें कार्य चला फिर 1932 में सरकार ने इसकी कमान अपने हाथों में ले ली। 1936 में इसका नाम बदलकर ऑल इंडिया रेडियो रख दिया गया।

रेडियो का प्रयोग आजादी के लड़ाई के दौरान स्वतंत्रता सेनानियों द्वारा भी किया गया। कांग्रेस पार्टी की एक महिला नेता ने पहली बार खुफिया रेडियो सेवा की आरंभ की थी। एक कॉलेज जाने वाली लड़की की कांग्रेस पार्टी के लिए खुफिया रेडियो सेवा प्रारम्भ करने की कहानी दिलचस्प है।

उषा मेहता ने खुफिया रेडियो सेवा की आरंभ की थी
कॉलेज जाने वाली एक लड़की ने प्रारम्भ की थी खुफिया रेडियो सेवा
स्वतंत्रता संग्राम के दौरान कांग्रेस पार्टी के नेताओं व जनता तक अपनी आवाज पहुंचाने के लिए उषा मेहता नाम की महिला ने खुफिया रेडियो सेवा की आरंभ की थी। बाद में वो रेडियो वूमेन के नाम से प्रसिद्ध हुईं।

उषा मेहता आजादी हासिल करने के लिए महात्मा गांधी के अहिंसा के रास्ते से प्रभावित थीं। उन्होंने बापू के बताए रास्ते पर चलकर स्वतंत्रता आंदोलन में खुद को झोंक दिया था। 9 अगस्त 1942 को बॉम्बे के गोवालिया टैंक मैदान से हिंदुस्तान छोड़ो आंदोलन की आरंभ हुई। महात्मा गांधी के साथ कांग्रेस पार्टी के सारे बड़े नेता अरैस्ट कर लिए गए। उषा मेहता समेत कांग्रेस पार्टी के कुछ छोटे नेता अरैस्ट होने से बच गए थे।

ये लोग गोवालिया टैंक मैदान पर तिरंगा फहराकर बापू के हिंदुस्तान छोड़ो आंदोलन की आवाज बने रहे। लेकिन बड़े नेताओं की गैरमौजूदगी में उनकी आवाज कहां तक सुनी जाती? 9 अगस्त 1942 की शाम कांग्रेस पार्टी के कुछ युवा समर्थकों ने बॉम्बे में मीटिंग की। इनलोगों का विचार था कि हिंदुस्तान छोड़ो आंदोलन की आग मद्धिम न पड़ने पाए, इसके लिए कुछ कदम उठाने महत्वपूर्ण थे। इनलोगों का मानना था कि अखबार निकालकर वो अपनी बात लोगों तक नहीं पहुंचा पाएंगे। क्योंकि ब्रिटिश सरकार के दमन के आगे अखबार की पहुंच सीमित होगी।

इस मीटिंग में रेडियो की समझ रखने वाले उषा मेहता जैसे युवा भी थे। यहीं से संचार के नए साधन रेडियो के प्रयोग के जरिए क्रांति की अलख जगाए रखने का आयडिया आया।

खुफिया रेडियो से प्रसारित किए जाते थे बापू समेत कांग्रेसी नेताओं के भाषण
अंग्रेजों के विरूद्ध खुफिया रेडियो सर्विस प्रारम्भ करने वालों में उषा मेहता के साथ थे बाबूभाई ठक्कर, विट्ठलदास झवेरी व नरीमन अबराबाद प्रिंटर। प्रिंटर इंग्लैंड से रेडियो की टेक्नोलॉजी सीखकर आए थे। उषा मेहता खुफिया रेडियो सर्विस की एनआउंसर बनाई गईं। पुराने ट्रांसमीटर को जोड़ तोड़कर प्रयोग में लाए जाने लायक बनाया गया व इस तरह से अंग्रेजों के विरूद्ध गोपनीय रेडियो सर्विस कांग्रेस पार्टी रेडियो की आरंभ हुई।

14 अगस्त 1942 को उषा मेहता ने अपने साथियों के साथ मिलकर एक खुफिया ठिकाने पर कांग्रेस पार्टी रेडियो की स्थापना की। इस खुफिया रेडियो सर्विस का पहला प्रसारण 27 अगस्त 1942 को हुआ। पहले प्रसारण में उषा मेहता ने धीमी आवाज में रेडियो पर घोषणा की- ये कांग्रेस पार्टी रेडियो की सेवा है, जो 42.34 मीटर पर हिंदुस्तान के किसी हिस्से से प्रसारित की जा रही है


उस वक्त उषा मेहता के साथ विट्ठलभाई झवेरी, चंद्रकांत झवेरी, बाबूभाई ठक्कर व ननका मोटवानी साथ थे। ननका मोटवानी शिकागो रेडियो के मालिक थे, इन्होंने ही रेडियो ट्रांसमिशन का कामचलाऊ उपकरण व टेक्निशियन उपलब्ध करवाए थे।

आजादी के आंदोलन को आवाज देने के लिए कांग्रेस पार्टी रेडियो प्रारम्भ हो चुका था। कांग्रेस पार्टी रेडियो के साथ युवा कांग्रेसियों के नेताओं के साथ डॉ राममनोहर लोहिया, अच्यूतराव पटवर्धन व पुरुषोत्तम जैसे सीनियर नेता भी जुड़ चुके थे। कांग्रेस पार्टी रेडियो के जरिए महात्मा गांधी व कांग्रेस पार्टी के दूसरे बड़े नेताओं के सम्बोधन प्रसारित किए जाते।

ज्यादा दिनों तक नहीं चल पाई खुफिया रेडियो सेवा
ब्रिटिश हुकूमत की नजरों से बचाने के लिए इस खुफिया रेडियो सेवा के स्टेशन करीब-करीब रोज बदले जाते थे। लेकिन तमाम कोशिशों के बावजूद खुफिया कांग्रेस पार्टी रेडियो सेवा को ज्यादा दिनों तक नहीं चलाया जा सका। 12 नवंबर 1942 को ब्रिटिश हुकूमत ने उषा मेहता समेत इसे चलाने वाले सारे लोगों को अरैस्ट कर लिया।

अंग्रेजों के सीआईडी विभाग ने छह महीने तक खुफिया रेडियो सेवा चलाने के मुद्दे की जाँच की। उषा मेहता समेत उनके साथी कारागार में डाल दिए गए थे। उच्च न्यायालय में इस मुद्दे का मुकदमा चला व उषा मेहता को चार वर्ष कैद की सजा सुनाई गई।