बिछ गईं लाशें ही लाशें, 18 मजदूरों की दर्दनाक मौत

बिछ गईं लाशें ही लाशें, 18 मजदूरों की दर्दनाक मौत

बीजिंग: चीन के लोग उस वक्त दहल उठे, जब एक कोयला खदान (China Coalmine) में 18 मजदूरों की मौत हो गई। इसके पीछे की वजह कार्बन मोनोक्साइड (Carbon Monoxide) के स्तर को बढ़ना बताया जा रहा है। इस घटना की जानकारी स्थानीय अधिकारी की ओर से दी गई है। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, यह घटना शुक्रवार शाम पांच बजे के आसपास की है। कार्बन मोनोक्साइड का स्तर बढ़ने से 18 मजदूरों की मौत हो गई है। वहीं अभी पांच लापता बताए जा रहे हैं, जिनकी तलाश की जा रही है।

इस घटना में 18 मजदूरों की मौत की पुष्टि
ये पूरी घटना चोंगकिंग नगर निगम के योगचुआन जिले में स्थित दियाओशुइदोंग कोयला खदान से सामने आई है। जानकारी के मुताबिक, एक मजदूर को बचा लिया गया है। बताया जा रहा है कि खदान (Coalmine) में कुछ कम उम्र के लड़के भी मौजूद थे। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबित, कार्बन मोनोक्साइड का स्तर बढ़ने से 18 मजदूरों की मौत की पुष्टि हुई है। घटना की जानकारी मिलते हुए मौके पर पुलिस और दमकल विभाग के अधिकारी सहित बचाव कर्मी उन मजदूरों की तलाश कर रहे हैं, जो खदान में फंसे हुए हैं।

कोयला खदान में साल 1975 से शुरू हुआ था खनन
फिलहाल अभी पुलिस हादसे की वजहों का पता लगाने में जुटी हुई है। स्थानीय आपात प्रबंधन विभाग के मुताबिक, योगचुआन जिले में स्थित दियाओशुइदोंग कोयला खदान में साल 1975 से खनन शुरू हुआ था और साल 1998 में इस खदान को प्राइवेट सेक्टर को सौंप दिया गया। इसकी वार्षिक उत्पादन क्षमता एक लाख बीस हजार टन कोयला है।

हर साल करीब पांच हजार होती हैं मौतें
चीन की कोयला खाने दुनिया में सबसे खतरनाक मानी जाती हैं। यहां पर मजदूरों की सुरक्षा के लिए ना के बराबर उपकरण मौजूद हैं। मीडिया रिपोर्ट्स की मानें तो यहां पर हर साल इस तरह की घटनाओं में करीब पांच हजार के आसपास से ज्यादा मौतें हो जाती हैं।


किस देश के स्पेस में कितने हैं सेटेलाइट, जानें भारत की दमदार स्थिति के बारे में

किस देश के स्पेस में कितने हैं सेटेलाइट, जानें भारत की दमदार स्थिति के बारे में

 बीते कुछ दशकों में भारत ने स्पेस की दुनिया में अपनी बादशाहत साबित की है। अमेरिका और रुस से मुकाबला करते हुए भारत उस फेहरिस्त में आ खड़ा हुआ है जहां दुनिया के चंद मुल्क ही पहुंचे है। इस पूरे सफर में भारत के मिशन 'चंद्रयान-2' को अपेक्षाकृत सफलता हाथ नहीं लग सकी लेकिन विश्व पटल पर भारत का डंका बजा।

यूनियन ऑफ कंसर्नड साइंटिस्ट सेटेलाइट डाटाबेस ने एक सूची तैयार की है। इस सूची में दुनिया के उन देशों के नाम दर्ज है जिन्होंने अंतरिक्ष में सफलता के झंडे गाड़े है। इस रिपोर्ट के अनुसार अमेरिका के स्पेस में अब तक 1038 सेटेलाइट है। चीन के स्पेस में 356 सेटेलाइट है। रुस के स्पेस में 167 सेटेलाइट, अमेरिका के 130, जापान के 78 और भारत के 58 सेटेलाइल स्पेस में है। इनमें से 339 सेटेलाइट का प्रयोग मिलिट्री के लिए, 133 का सिविल के लिए, 1440 का कॉमर्शियल इस्तेमाल के लिए और 318 मिक्स्ड यूज के लिए है।

58 सालों का धमाकेदार सफर

भारत की अंतरिक्ष यात्रा की शुरुआत 21 नवंबर 1963 को हुई थी जब भारत ने केरल में मछली पकड़ने वाले क्षेत्र थुंबा से अमेरिकी निर्मित दो-चरण वाला साउंडिंग रॉकेट ‘नाइक-अपाचे’ का प्रक्षेपण किया था। यह अंतरिक्ष की ओर भारत का पहला कदम था। उस वक्‍त भारत के पास न तो इस प्रक्षेपण के लिए जरूरी सुविधाएं थीं और न ही मूलभूत ढांचा उपलब्‍ध था। चूंकि थुंबा रॉकेट प्रक्षेपण स्टेशन पर कोई इमारत नहीं थी इसलिए वहां के स्‍थानीय बिशप के घर को निदेशक का ऑफिस बनाया गया। प्राचीन सेंट मैरी मेगडलीन चर्च की इमारत कंट्रोल रूम बनी और नंगी आंखों से धुआं देखा गया। यहां तक की रॉकेट के कलपुर्जों और अंतरिक्ष उपकरणों को प्रक्षेपण स्थल पर बैलगाड़ी और साइकिल से ले जाया गया था।

16 नवंबर 2013, को अंतरिक्ष विज्ञान के इतिहास में भारत ने एक नया अध्याय लिखा। इस दिन 2:39 मिनट पर आंध्र प्रदेश के श्रीहरिकोटा से PSLV C-25 मार्स ऑर्बिटर (मंगलयान) का अंत‍रिक्ष का सफर शुरू हुआ। 24 सितंबर 2014 को मंगल पर पहुंचने के साथ ही भारत इस तरह के अभियान में पहली ही बार में सफल होने वाला पहला देश गया। इसके साथ ही वह सोवियत रूस, नासा और यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी के बाद इस तरह का मिशन भेजने वाला दुनिया का चौथा देश बन गया। इसके अतिरिक्त ये मंगल पर भेजा गया सबसे सस्ता मिशन भी है।