ताइवान की एक इमारत में लगी भीषण आग, 46 लोगों की मौत

ताइवान की एक इमारत में लगी भीषण आग, 46 लोगों की मौत

दक्षिणी ताइवान में 13 मंजिला एक इमारत में आग लगने की घटना में जान गंवाने वालों की संख्या बढ़कर 46 हो गई है। लगभग 51 लोग इस आग झुलस गए हैं, जिन्‍हें अस्‍पताल में भर्ती कराया गया है। काऊशुंग शहर के दमकल विभाग के अधिकारियों ने एक बयान में बताया कि आग तड़के करीब तीन बजे लगी थी। आग इतनी तेजी से फैली की इसने काफी क्षेत्र को अपनी गिरफ्त में ले लिया। वहीं, आग ऐसे समय लगी कि लोगों को सोचने-समझने का मौका ही नहीं मिला। दमकलकर्मी तलाश एवं बचाव अभियान में जुटे हैं। निचली मंजिलों की आग बुझा दी गई है।

ये आग कैसे लगी, अभी इसका कारण पता नहीं चल पाया है। चश्मदीदों का कहना है कि उन्होंने तड़के लगभग तीन बजे एक विस्फोट की आवाज सुनी थी। इसके बाद आग की लपटे दिखाई देने लगीं। स्‍थानीय प्रशासन के आधिकारिक बयान के अनुसार, इमारत 40 साल पुरानी थी, जिसकी निचली मंजिल पर दुकानें और ऊपर अपार्टमेंट हैं।

ताइवान में ऐसे हादसों में मौत के आंकड़ों की आधिकारिक पुष्टि अस्पताल में ही की जाती है। दमकल विभाग के प्रमुख ने मीडिया को बताया कि 11 लोगों की मौके पर ही मौत हो गई थी। मृतकों के शव मुर्दाघर भेजे गए हैं। दमकल विभाग के बयान के अनुसार, आग बेहद भीषण थी और इमारत की कई मंजिलें आग में खाक हो गईं। आग पर काबू पा लिया गया है। पूरी इमारत आग की लपटों के कारण काली हो गई है। इसे देख अंदाजा लगाना मुश्किल है कि यहां कभी कोई रहता भी था कि नहीं।


कोयले के इस्तेमाल करने पर जी 20 देशों में मतभेद, पर्यावरण पर होने वाली रोम की बैठक पर संकट के बादल

कोयले के इस्तेमाल करने पर जी 20 देशों में मतभेद, पर्यावरण पर होने वाली रोम की बैठक पर संकट के बादल

बिजली के उत्पादन में कोयले का इस्तेमाल बंद करने के मुद्दे पर दुनिया के 20 सबसे संपन्न देशों में मतभेद पैदा हो गए हैं। धरती का तापमान 1.5 डिग्री सेल्सियस तक सीमित रखने के लिए बड़े पैमाने पर कोयले का इस्तेमाल जरूरी माना गया है। इससे इटली की राजधानी रोम में 30-31 अक्टूबर को होने वाली जी 20 देशों के नेताओं की बैठक में पर्यावरण सुधार के मसले पर आमराय बनने की संभावना क्षीण हो गई है। यह बैठक स्काटलैंड के ग्लासगो में संयुक्त राष्ट्र के बैनर तले इसी साल पर्यावरण पर होने वाले अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन की तैयारी बैठक के रूप में देखी जा रही है।

इसी साल जुलाई में नेपल्स में हुए दुनिया के ऊर्जा और पर्यावरण मंत्रियों के सम्मेलन में कोयले का सबसे ज्यादा इस्तेमाल कर रहे चीन और भारत ने पर्यावरण सुधार के लिए जिन कदमों का आश्वासन दिया था, वह उन्होंने पूरा नहीं किया है। यह बात नाम स्पष्ट न किए जाने की शर्त पर तीन सूत्रों ने कही है। विशेषज्ञों के अनुसार दोनों विकासशील देश कोविड-19 महामारी से पैदा हुई मंदी से निपटने के लिए अपने ऊर्जा उत्पादन में कमी नहीं करना चाहते हैं। यही वजह कोयला इस्तेमाल में कमी नहीं होने दे रही। दोनों देशों का मानना है कि अमेरिका, ब्रिटेन और अन्य विकसित देश 20 वीं सदी में कोयले का इस्तेमाल कर पर्यावरण को नुकसान पहुंचाते हुए लाभ अर्जित कर चुके हैं। अब जबकि भारत और चीन अपनी जरूरत के लिए कोयले का इस्तेमाल कर रहे हैं तब उनकी गतिविधियों पर रोक लगाने के लिए कहा जा रहा है। भारत पश्चिमी देशों से पर्यावरण सुधार के लिए प्रदूषण मुक्त नई तकनीक के साथ ही कोयले का इस्तेमाल कम करने के बदले आर्थिक सहायता चाहता है। पेरिस समझौते में विकासशील देशों के लिए ये प्रविधान हैं। लेकिन सहायता में व्यवधान पड़ने के कारण कोयले का इस्तेमाल तेज गति से कम नहीं हो पा रहा है।


संयुक्त राष्ट्र के बैनर तले हुए पेरिस समझौते में धरती का तापमान 1.5 डिग्री सेल्सियस से कम करने पर सहमति बनी थी। इस समझौते की ग्लासगो में समीक्षा होनी है और भविष्य के लिए रूपरेखा तय होनी है। लेकिन कोविड महामारी के चलते बने हालात ने इस प्रक्रिया के बाधित होने की आशंका पैदा कर दी है।