अधिकारियों को दी गई माफी का सम्मान करें लड़ाके, नई सरकार को बदनाम न होने दें : तालिबान

अधिकारियों को दी गई माफी का सम्मान करें लड़ाके, नई सरकार को बदनाम न होने दें : तालिबान

तालिबान ने गुरुवार को अपने लड़ाकों से सभी अफगान सरकारी अधिकारियों को दी गई सामान्य माफी का सम्मान करने और इस्लामिक अमीरात की नई सरकार को बदनाम नहीं करने का आग्रह किया। द खामा प्रेस न्यूज एजेंसी की रिपोर्ट कहती है, अफगानिस्तान के इस्लामिक अमीरात के कार्यवाहक रक्षा मंत्री मुल्ला मोहम्मद याकूब ने अपने लड़ाकों से कहा कि सामान्य माफी की घोषणा की गई है और किसी को भी अपने मनमानी कार्यों से इस्लामिक अमीरात आफ अफगानिस्तान (IEA) को बदनाम नहीं करना चाहिए।

कार्यवाहक रक्षा मंत्री ने उनसे सामान्य माफी को गंभीरता से लागू करने और लोगों के साथ दुर्व्यवहार न करने को कहा है। याकूब द्वारा जारी एक बयान में कहा गया है कि तालिबान के कुछ सदस्यों को विभिन्न प्रांतों में प्रतिशोध करते देखा गया है और पिछली सरकार के लिए काम करने वालों को मार डाला गया है, जो अफगानिस्तान के इस्लामी अमीरात की नीति नहीं है।


तालिबान लड़ाकों को संबोधित बयान में कहा गया है, लोगों के साथ अच्छा व्यवहार करें, अपने मनमाने कार्यों से आईईए को बदनाम न करें, अनावश्यक तस्वीरें और वीडियो लेना बंद करें और सरकारी प्रशासन में प्रवेश न करें।

तालिबान के संस्थापक के बेटे ने आगे कहा कि तालिबान के कुछ कमांडरों ने अपने रैंक का विस्तार करने के लिए बीमार लोगों की भर्ती की है जो आईईए के विरोध में हैं। दोषियों को सजा दी जाएगी। बता दें कि तालिबान के कुछ लड़ाकों द्वारा पिछली सरकार के अधिकारियों के घरों में रात में घुसने और उन्हें मारने और अपहरण करने के बाद यह अपील की गई है।


कोयले के इस्तेमाल करने पर जी 20 देशों में मतभेद, पर्यावरण पर होने वाली रोम की बैठक पर संकट के बादल

कोयले के इस्तेमाल करने पर जी 20 देशों में मतभेद, पर्यावरण पर होने वाली रोम की बैठक पर संकट के बादल

बिजली के उत्पादन में कोयले का इस्तेमाल बंद करने के मुद्दे पर दुनिया के 20 सबसे संपन्न देशों में मतभेद पैदा हो गए हैं। धरती का तापमान 1.5 डिग्री सेल्सियस तक सीमित रखने के लिए बड़े पैमाने पर कोयले का इस्तेमाल जरूरी माना गया है। इससे इटली की राजधानी रोम में 30-31 अक्टूबर को होने वाली जी 20 देशों के नेताओं की बैठक में पर्यावरण सुधार के मसले पर आमराय बनने की संभावना क्षीण हो गई है। यह बैठक स्काटलैंड के ग्लासगो में संयुक्त राष्ट्र के बैनर तले इसी साल पर्यावरण पर होने वाले अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन की तैयारी बैठक के रूप में देखी जा रही है।

इसी साल जुलाई में नेपल्स में हुए दुनिया के ऊर्जा और पर्यावरण मंत्रियों के सम्मेलन में कोयले का सबसे ज्यादा इस्तेमाल कर रहे चीन और भारत ने पर्यावरण सुधार के लिए जिन कदमों का आश्वासन दिया था, वह उन्होंने पूरा नहीं किया है। यह बात नाम स्पष्ट न किए जाने की शर्त पर तीन सूत्रों ने कही है। विशेषज्ञों के अनुसार दोनों विकासशील देश कोविड-19 महामारी से पैदा हुई मंदी से निपटने के लिए अपने ऊर्जा उत्पादन में कमी नहीं करना चाहते हैं। यही वजह कोयला इस्तेमाल में कमी नहीं होने दे रही। दोनों देशों का मानना है कि अमेरिका, ब्रिटेन और अन्य विकसित देश 20 वीं सदी में कोयले का इस्तेमाल कर पर्यावरण को नुकसान पहुंचाते हुए लाभ अर्जित कर चुके हैं। अब जबकि भारत और चीन अपनी जरूरत के लिए कोयले का इस्तेमाल कर रहे हैं तब उनकी गतिविधियों पर रोक लगाने के लिए कहा जा रहा है। भारत पश्चिमी देशों से पर्यावरण सुधार के लिए प्रदूषण मुक्त नई तकनीक के साथ ही कोयले का इस्तेमाल कम करने के बदले आर्थिक सहायता चाहता है। पेरिस समझौते में विकासशील देशों के लिए ये प्रविधान हैं। लेकिन सहायता में व्यवधान पड़ने के कारण कोयले का इस्तेमाल तेज गति से कम नहीं हो पा रहा है।


संयुक्त राष्ट्र के बैनर तले हुए पेरिस समझौते में धरती का तापमान 1.5 डिग्री सेल्सियस से कम करने पर सहमति बनी थी। इस समझौते की ग्लासगो में समीक्षा होनी है और भविष्य के लिए रूपरेखा तय होनी है। लेकिन कोविड महामारी के चलते बने हालात ने इस प्रक्रिया के बाधित होने की आशंका पैदा कर दी है।