संयुक्त राष्ट्र में भारत बोला- हम एक जिम्मेदार एटामिक पावर देश, गैर परमाणु हथियार वाले देशों पर नहीं करेंगे हमला

संयुक्त राष्ट्र में भारत बोला- हम एक जिम्मेदार एटामिक पावर देश, गैर परमाणु हथियार वाले देशों पर नहीं करेंगे हमला

संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन में भारतीय राजदूत पंकज शर्मा ने निशस्त्रीकरण पर कहा कि भारत एक जिम्मेदार परमाणु हथियार संपन्न देश है। भारत वैश्विक, बिना भेदभाव और विश्वसनीय परमाणु निशस्त्रीकरण के प्रति पूरी तरह से प्रतिबद्ध है। साथ ही वह न्यूनतम प्रतिरोधक क्षमता की अपनी नीति पर पूरी विश्वसनीयता के साथ कायम है। भारत पहले हमला नहीं करने की नीति और गैर परमाणु हथियार संपन्न देशों पर इसका इस्तेमाल नहीं करने की नीति पर कायम है।


संयुक्त राष्ट्र महासभा के 76वें सत्र में भारतीय राजनयिक ने वैश्विक शांति व सुरक्षा के बहुआयामों का जिक्र किया और इसके प्रति उभरते खतरों का भी उल्लेख किया। इसमें सामूहिक विनाश के हथियारों से लेकर आतंकवाद और साइबर खतरे का भी जिक्र किया गया।

राजदूत शर्मा ने कहा कि भारत का प्रस्ताव है कि एक के बाद एक पूरी तरह से परमाणु हथियारों को खत्म किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि इस बात का जिक्र भारत ने वर्ष 2007 के निशस्त्रीकरण पर हुए सम्मेलन में भी किया है। उन्होंने एक समग्र परमाणु हथियार सम्मेलन कराने का भी आहान किया है। उन्होंने कहा कि भारत हमेशा इस मुद्दे के तीन अहम पहलुओं की ओर प्रतिबद्ध रहेगा। हम वरीयता के प्रति बिना किसी पूर्वाग्रह के परमाणु निशस्त्रीकरण से संबद्ध हैं। हम उम्मीद करते हैं कि ऐसे सम्मेलन से राजनीतिक इच्छाशक्ति भी बढ़ेगी।

भारतीय राजदूत शर्मा ने कहा कि भारत पहले इसका इस्तेमाल नहीं करने और किसी गैर परमाणु हथियार संपन्न देश के खिलाफ परमाणु हथियार का इस्तेमाल नहीं करने के अपने रुख में भी बदलाव लाने को तैयार है। वह अपने इस रुख को बहुआयामी कानूनी व्यवस्था में बदल सकता है। राजदूत शर्मा ने आगे कहा कि भारत रासायनिक हथियारों के सम्मेलन को उच्चस्तरीय महत्व देता है और इसे प्रभावशाली तरीके से अमल में लाना चाहता है। 


कोयले के इस्तेमाल करने पर जी 20 देशों में मतभेद, पर्यावरण पर होने वाली रोम की बैठक पर संकट के बादल

कोयले के इस्तेमाल करने पर जी 20 देशों में मतभेद, पर्यावरण पर होने वाली रोम की बैठक पर संकट के बादल

बिजली के उत्पादन में कोयले का इस्तेमाल बंद करने के मुद्दे पर दुनिया के 20 सबसे संपन्न देशों में मतभेद पैदा हो गए हैं। धरती का तापमान 1.5 डिग्री सेल्सियस तक सीमित रखने के लिए बड़े पैमाने पर कोयले का इस्तेमाल जरूरी माना गया है। इससे इटली की राजधानी रोम में 30-31 अक्टूबर को होने वाली जी 20 देशों के नेताओं की बैठक में पर्यावरण सुधार के मसले पर आमराय बनने की संभावना क्षीण हो गई है। यह बैठक स्काटलैंड के ग्लासगो में संयुक्त राष्ट्र के बैनर तले इसी साल पर्यावरण पर होने वाले अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन की तैयारी बैठक के रूप में देखी जा रही है।

इसी साल जुलाई में नेपल्स में हुए दुनिया के ऊर्जा और पर्यावरण मंत्रियों के सम्मेलन में कोयले का सबसे ज्यादा इस्तेमाल कर रहे चीन और भारत ने पर्यावरण सुधार के लिए जिन कदमों का आश्वासन दिया था, वह उन्होंने पूरा नहीं किया है। यह बात नाम स्पष्ट न किए जाने की शर्त पर तीन सूत्रों ने कही है। विशेषज्ञों के अनुसार दोनों विकासशील देश कोविड-19 महामारी से पैदा हुई मंदी से निपटने के लिए अपने ऊर्जा उत्पादन में कमी नहीं करना चाहते हैं। यही वजह कोयला इस्तेमाल में कमी नहीं होने दे रही। दोनों देशों का मानना है कि अमेरिका, ब्रिटेन और अन्य विकसित देश 20 वीं सदी में कोयले का इस्तेमाल कर पर्यावरण को नुकसान पहुंचाते हुए लाभ अर्जित कर चुके हैं। अब जबकि भारत और चीन अपनी जरूरत के लिए कोयले का इस्तेमाल कर रहे हैं तब उनकी गतिविधियों पर रोक लगाने के लिए कहा जा रहा है। भारत पश्चिमी देशों से पर्यावरण सुधार के लिए प्रदूषण मुक्त नई तकनीक के साथ ही कोयले का इस्तेमाल कम करने के बदले आर्थिक सहायता चाहता है। पेरिस समझौते में विकासशील देशों के लिए ये प्रविधान हैं। लेकिन सहायता में व्यवधान पड़ने के कारण कोयले का इस्तेमाल तेज गति से कम नहीं हो पा रहा है।


संयुक्त राष्ट्र के बैनर तले हुए पेरिस समझौते में धरती का तापमान 1.5 डिग्री सेल्सियस से कम करने पर सहमति बनी थी। इस समझौते की ग्लासगो में समीक्षा होनी है और भविष्य के लिए रूपरेखा तय होनी है। लेकिन कोविड महामारी के चलते बने हालात ने इस प्रक्रिया के बाधित होने की आशंका पैदा कर दी है।