अमेरिका में स्वीकृत टीके पहली बार विदेश भेजेगा अमेरिका, राष्ट्रपति जो बाइडन का एलान

अमेरिका में स्वीकृत टीके पहली बार विदेश भेजेगा अमेरिका, राष्ट्रपति जो बाइडन का एलान

अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन ने सोमवार को एलान किया कि अमेरिका जून के अंत तक अपने यहां स्वीकृत वैक्सीन की कम-से-कम दो करोड़ डोज अन्य देशों को देगा। यह पहली बार है, जब अमेरिका ने अपने देश में स्वीकृत वैक्सीन अन्य देशों को देने की घोषणा की है।

बाइडन ने कहा कि वे फाइजर, बायाएनटेक, माडर्ना, जानसन एंड जानसन और एस्ट्राजेनेका की वैक्सीन अन्य देशों को देने की योजना बना चुके हैं। हालांकि, अन्य वैक्सीनों की तरह एस्ट्राजेनेका की वैक्सीन को अमेरिका में इस्तेमाल की अनुमति नहीं मिली है।

बाइडन ने कहा कि दुनिया का कोई भी देश अमेरिका से ज्यादा वैक्सीन विदेश नहीं भेजेगा। अमेरिका में लगभग 60 फीसद वयस्क नागरिकों को वैक्सीन की कम-से-कम एक डोज दी जा चुकी है। टीकाकरण के मामले में यह भारत और ब्राजील जैसे कई अन्य देशों से आगे है, जो कोरोना महामारी को रोकने के लिए संघर्ष कर रहे हैं।


किस देश के स्पेस में कितने हैं सेटेलाइट, जानें भारत की दमदार स्थिति के बारे में

किस देश के स्पेस में कितने हैं सेटेलाइट, जानें भारत की दमदार स्थिति के बारे में

 बीते कुछ दशकों में भारत ने स्पेस की दुनिया में अपनी बादशाहत साबित की है। अमेरिका और रुस से मुकाबला करते हुए भारत उस फेहरिस्त में आ खड़ा हुआ है जहां दुनिया के चंद मुल्क ही पहुंचे है। इस पूरे सफर में भारत के मिशन 'चंद्रयान-2' को अपेक्षाकृत सफलता हाथ नहीं लग सकी लेकिन विश्व पटल पर भारत का डंका बजा।

यूनियन ऑफ कंसर्नड साइंटिस्ट सेटेलाइट डाटाबेस ने एक सूची तैयार की है। इस सूची में दुनिया के उन देशों के नाम दर्ज है जिन्होंने अंतरिक्ष में सफलता के झंडे गाड़े है। इस रिपोर्ट के अनुसार अमेरिका के स्पेस में अब तक 1038 सेटेलाइट है। चीन के स्पेस में 356 सेटेलाइट है। रुस के स्पेस में 167 सेटेलाइट, अमेरिका के 130, जापान के 78 और भारत के 58 सेटेलाइल स्पेस में है। इनमें से 339 सेटेलाइट का प्रयोग मिलिट्री के लिए, 133 का सिविल के लिए, 1440 का कॉमर्शियल इस्तेमाल के लिए और 318 मिक्स्ड यूज के लिए है।

58 सालों का धमाकेदार सफर

भारत की अंतरिक्ष यात्रा की शुरुआत 21 नवंबर 1963 को हुई थी जब भारत ने केरल में मछली पकड़ने वाले क्षेत्र थुंबा से अमेरिकी निर्मित दो-चरण वाला साउंडिंग रॉकेट ‘नाइक-अपाचे’ का प्रक्षेपण किया था। यह अंतरिक्ष की ओर भारत का पहला कदम था। उस वक्‍त भारत के पास न तो इस प्रक्षेपण के लिए जरूरी सुविधाएं थीं और न ही मूलभूत ढांचा उपलब्‍ध था। चूंकि थुंबा रॉकेट प्रक्षेपण स्टेशन पर कोई इमारत नहीं थी इसलिए वहां के स्‍थानीय बिशप के घर को निदेशक का ऑफिस बनाया गया। प्राचीन सेंट मैरी मेगडलीन चर्च की इमारत कंट्रोल रूम बनी और नंगी आंखों से धुआं देखा गया। यहां तक की रॉकेट के कलपुर्जों और अंतरिक्ष उपकरणों को प्रक्षेपण स्थल पर बैलगाड़ी और साइकिल से ले जाया गया था।

16 नवंबर 2013, को अंतरिक्ष विज्ञान के इतिहास में भारत ने एक नया अध्याय लिखा। इस दिन 2:39 मिनट पर आंध्र प्रदेश के श्रीहरिकोटा से PSLV C-25 मार्स ऑर्बिटर (मंगलयान) का अंत‍रिक्ष का सफर शुरू हुआ। 24 सितंबर 2014 को मंगल पर पहुंचने के साथ ही भारत इस तरह के अभियान में पहली ही बार में सफल होने वाला पहला देश गया। इसके साथ ही वह सोवियत रूस, नासा और यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी के बाद इस तरह का मिशन भेजने वाला दुनिया का चौथा देश बन गया। इसके अतिरिक्त ये मंगल पर भेजा गया सबसे सस्ता मिशन भी है।