जानिए, सेहत के लिए कितने फायदेमंद है ये पौधे

जानिए, सेहत के लिए कितने फायदेमंद है ये पौधे

स्मॉग ने एक बार फिर हमारे शहरों में दस्तक देनी शुरू कर दी है. आने वाले कुछ दिनों में पिछले वर्षों की तरह इस साल भी स्मॉग से लोगों का बुरा हाल होगा. डीजल वाहनों की बढ़ती संख्या, फैक्टरियों, बिजलीघरों से निकलने वाला धुआं, उत्तर भारत में पराली जलाने की घटनाओं के कारण हर कोई वायु प्रदूषण को लेकर परेशान रहता है.

कई लोगों को लगता है कि केवल अपने घर के खिड़की-दरवाजे बंद करना ही इससे छुटकारा पाने का इकलौता विकल्प है. बिगड़ते हालात के कारण एयर प्यूरिफायर जैसे गैजेट्स भी महानगरों के घरों में जगह बनाने लगे हैं. सोचने का विषय यह है कि क्या केवल घर को बंद रखने या गैजेट्स खरीद लेना काफी है? ऐसा कतई नहीं है. घर के भीतर लगाए जा सकने वाले अनेक ऐसे इंडोर प्लांट्स हैं जो हमारे घर को शुद्ध हवा का ठिकाना बना सकते हैं.

मनी प्लांट

इसे गोल्डन पोथोस या डेविल्स आईवी के नाम से भी जाना जाता है. मनी प्लांट की हरी-भरी पत्तियां दिल के आकार की होती हैं, जिनमें स्वर्णिम रंग की हल्की सी झलक होती है. मनी प्लांट्स घर के भीतर इस्तेमाल किए जाने वाले प्लांट्स में सबसे आम हैं. चूंकि यह प्लांट रात के वक्त भी ऑक्सीजन देता है इसलिए इसे लिविंग रूम की ही तरह बेडरूम में भी रखा जा सकता है. मनी प्लांट को पानी और ठोस सतह (मिट्टी) पर भी लगाया जा सकता है. इसके अलावा अगर आपके बगीचे में पहले से ही मनी प्लांट मौजूद है तो आपको केवल उसका एक हिस्सा मिट्टी या पानी में लगाना है और यह अपने-आप बढ़ने लगता है. आपको केवल एक ही बात याद रखनी है कि अगर यह पानी में पनप रहा है तो हर हफ्ते पानी बदलते रहें. मनी प्लांट के कारण घर से कार्बन मोनोऑक्साइड, बेंजीन, फॉर्मेल्डाइड, जाइलिन, टूलिन जैसी गैसें और यौगिक खत्म हो जाते हैं.
पीस लिली

बड़ी हरी पत्तियों वाला यह प्लांट घर के भीतर से बेंजीन, ट्राइक्लोइथेन, फॉर्मेल्डाइड को खत्म करता है.

स्नेक प्लांट

वाइपर्स बोस्ट्रिंग हेम्प के भी नाम से मशहूर यह पौधा हवा से जाइलिन, बेंजीन और टूलिन जैसे टॉक्सिन्स और यौगिकों को खत्म करता है. मनी प्लांट की ही तरह स्नेक प्लांट भी रात को ऑक्सीजन देता है. इन प्लांट्स को ज्यादा देखभाल की जरूरत नहीं होती. यह कई दिन बिना पानी के जिंदा रह सकते हैं.

एरेका पाम

इसे येलो पाम और गोल्डन केन प्लांट के नाम से भी जाना जाता है. नासा की रिसर्च के मुताबिक यह प्लांट हवा से फॉर्मेल्डेहाइड को हटाने के लिहाज से शीर्ष 10 प्लांट्स में आता है. यह प्लांट एक अच्छा ह्यूमिडिफायर है. एक छह फीट का एरेका पाम ट्री केवल 24 घंटे में एक लीटर पानी दे सकता है. फॉर्मेल्डाइड के अलावा यह प्लांट हवा से कार्बन मोनोऑक्साइड, बेंजीन, जाइलिन और ट्राइक्लोरोएथिलिन को हटा सकता है.

रबर प्लांट

इसे रबर बुश प्लांट के नाम से भी जाना जाता है. यह हवा में मौजूद वाष्पशील कार्बनिक यौगिकों और बायो एफ्लुएंट्स हटा देता है. अगर आपके घर में पालतु पशु हैं तो कृपया यह प्लांट न लगाएं, क्योंकि कुछ पशुओं के लिए यह टॉक्सिक होता है.

एलो वेरा

हम सभी जानते हैं कि एलोवेरा की पत्तियों के भीतर मौजूद जेल का घावों और जली हुई जगहों के इलाज में इस्तेमाल किया जाता है. कई लोग इसे मॉइस्चराइजर के तौर पर भी इस्तेमाल करते हैं लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि एलोवेरा हवा को साफ करने में भी बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है. यह हवा से बेंजीन और फॉर्मेल्डेहाइड को हटाता है और यह भी रात को ऑक्सीजन का उत्सर्जन करता है.

वीपिंग फिग प्लांट

इसे बेंजामिन फिग और फिकस ट्री के नाम से भी जाना जाता है. नासा द्वारा किए गए एक अध्ययन के मुताबिक यह प्लांट बेंजीन, जाइलिन, टूलीन, ट्राइक्लोरोएथिलिन और फॉर्मेल्डेहाइड का हवा से सफाया करता है. रबर प्लांट की ही तरह यह भी कुछ पालतु पशुओं के लिए जहरीला होता है.

कॉमन आइवी

इसे इंग्लिश आइवी, यूरोपियन आइवी और आइवी के नाम से भी जाना जाता है. यह हवा से जाइलिन, बेंजीन, टूलीन और फॉर्मेल्डाइड को हटाती है. इसके अलावा इस प्लांट को हवा से अस्थमा के मरीजों को परेशान करने वाले कुछ कणों को हटाने के लिए भी जाना जाता है.

चाइनीज एवरग्रीन प्लांट

यह हवा से कार्बन मोनोऑक्साइड, बेंजीन, ट्राइक्लोरोएथिलिन और फॉर्मेल्डेहाइड को हटाता है. यह याद रखिएगा कि इस प्लांट के लिए कमरे का तापमान 16 डिग्री सेल्सियस या उससे ज्यादा होना चाहिए. यह प्लांट ठंड को बिल्कुल भी सहन नहीं कर पाता.


बच्चों और महिलाओं में पोषण की कमी से हो सकती हैं ये दिक्कतें

बच्चों और महिलाओं में पोषण की कमी से हो सकती हैं ये दिक्कतें

सेहत के लिए जानना जरूरी है कि कब, क्या और कितना खाना चाहिए। गर्भावस्था के दौरान यह और जरूरी होता है, क्योंकि आपके संग बच्चे की सेहत का सवाल भी होता है। हालांकि, भारत में पोषण के कुछ फैक्ट इसकी दुखद तस्वीर पेश करते हैं।

भारत में 26.8 फीसदी महिलाओं की शादी 18 साल से पहले हो जाती है। इसकी वजह से 22.9 प्रतिशत महिलाएं प्रेग्नेंसी के समय कम वजन की होती हैं। यही कारण है कि भारत में 58 फीसदी महिलाएं एनीमिया की शिकार हैं।

गर्भावस्था के दौरान पोषण इसलिए भी बहुत महत्वपूर्ण हो जाता है, क्योंकि आपके शरीर में बहुत से बदलाव होते हैं। बच्चे की ग्रोथ के लिए यह काफी अहम भी है। इस दौरान फीटल ग्रोथ रिस्ट्रिक्शन (एफजीआर) का जोखिम काफी होता है। दुनियाभर में इसकी वजह से एक-चौथाई बच्चे काल के गाल में समा जाते हैं। खराब पोषण की वजह से बच्चे समुचित वजन हासिल नहीं कर पाते हैं। वहीं, कुछ मामलों में इसकी वजह से बच्चों का कॉगनिटिव विकास नहीं हो पाता है।

वयस्क रोग की भ्रूण उत्पत्ति

ऐसा स्वीकार किया जा चुका है कि गंभीर बीमारियों की बड़ी वजह खराब लाइफस्टाइल है। कोरोनरी हार्ट डिजीज, डाइबिटीज मेलिटस और हाइपरटेंशन फेटल लाइफ न्यूट्रिशन के बाई-प्रोडक्ट्स होते हैं। फीटल लाइफ के समय महिलाओं के भूखे रहने से इंसुलिन रजिस्टेंस सिंड्रोम होने की संभावना बढ़ जाती है। ऐसे में गर्भावस्था को दौरान बेहतर न्यूट्रिशन जरूरी है, क्योंकि इससे बाल मृत्यु दर, पैटर्न बर्थ, कम वजन के बच्चे पैदा होने जैसी दिक्कतों का सामना नहीं करना पड़ता है।

मां के समुचित पोषण के ये हैं असर-

-मां के माइक्रोन्यूट्रिएंट स्तर में सुधार

- कम वजन के बच्चों में कमी

-पोस्ट डिलीवरी ब्लीडिंग एमएमआर में कमी

-मातृत्व एनीमिया में कमी, प्रीमैच्योर बेबी में कमी

-गर्भपात में कमी, दिमाग के नुकसान में कमी

मातृत्व पोषण को ऐसे सुधारें

स्वस्थ खान-पान के लिए काउंसिलिंग करें। बैलेंस्ड एनर्जी और प्रोटीन डाइटरी सप्लीमेंट्स लें। फोलिक एसिड सप्लीमेंटेशन (400 माइक्रोग्राम) पहले ट्राइमिस्टर में लें। आयरन और फोलिक एसिड दूसरी तिमाही में रोजाना लें। कैल्शियम सप्लीमेंट्स दूसरी तिमाही में रोजाना लें। कैफीन का सेवन कम करें। पास्चुराइज्ड दूध ही लें। बिना पका और कम पका खाना न लें। बिना पका मीट भी न लें। किसी भी फल-सब्जी को धोकर खाएं। खाना खाने से पहले हाथ धोएं। बागवानी करते समय दास्ताने पहनें और हाथों को अच्छी तरह धोएं।

गर्भावस्था में डाइट

-प्रेग्नेंसी में अतिरिक्त ऊर्जा के रूप में 350 किलो कैलोरी की आवश्यकता होती है

-दूसरी और तीसरी तिमाही में पोषक स्नैक्स जरूरी है

-कम वजन वाली प्रेग्नेंट महिलाएं एक अतिरिक्त स्नैक्स लें। अधिक वजह वाली महिलाएं पूरे दिन में छोटे-छोटे मील (खाना) लें।

-कम पोषण वाला खाना खाने की वजह से महिलाओं को चक्कर आना, मितली आना, भूख कम लगना जैसे समस्याएं होती हैं।


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