रणनीतिक विनिवेश के लक्ष्य की प्राप्ति में ढिलाई पर कैग ने किए हैं सवाल खड़े

रणनीतिक विनिवेश के लक्ष्य की प्राप्ति में ढिलाई पर कैग ने किए हैं सवाल खड़े

सरकार की तरफ से सरकारी कंपनियों के रणनीतिक विनिवेश के लक्ष्य की प्राप्ति में ढिलाई पर कैग ने सवाल खड़े किए हैं. कैग का मानना है कि 2017-18 में सार्वजनिक उपक्रमों के चयन के बावजूद कंपनियों के रणनीतिक विनिवेश के लक्ष्य के समीप भी नहीं पहुंचा जा सका. साथ ही कैग ने बोला है कि डिविडेंड के विषय में सरकार के दिशार्निदेशों का पालन नहीं होने से 2017-18 में खजाने को 9471 करोड़ रुपये का नुकसान उठाना पड़ा.

संसद में मंगलवार को सार्वजनिक उपक्रमों पर प्रस्तुत अपनी रिपोर्ट में हिंदुस्तान के नियंत्रक और महालेखा परीक्षक (कैग) ने बोला कि विनिवेश के लिए जिम्मेदार विभाग दीपम और सभी प्रशासनिक मंत्रालयों को इस लक्ष्य को पूरा करने के लिए आपसी समन्वय व ज्यादा बेहतर कोशिश करने की आवश्यकता है. इससे बाकी बचे उपक्रमों के रणनीतिक विनिवेश की प्रक्रिया को तेज किया जा सकेगा.

साल 2017-18 में रणनीतिक विनिवेश के लिए 24 उपक्रमों का चयन किया गया था. लेकिन 2018-19 तक इनमें से केवल चार उपक्रमों का ही रणनीतिक विनिवेश हो पाया. सरकार ने इस बीच आरईसी के रणनीतिक विनिवेश की प्रक्रिया पूरी की, लेकिन कैग का मानना है कि यह इस सूची से बाहर का विनिवेश था.

एचपीसीएल के रणनीतिक विनिवेश के विषय में कैग ने अपनी रिपोर्ट में बोला है कि यद्यपि एचपीसीएल-ओएनजीसी सौदा सीसीईए द्वारा निर्धारित रणनीतिक बिक्री के मानकों के अनुरूप हुआ है. लेकिन इसके ऑडिट को इस लाइट में देखा जाना चाहिए कि एक सरकारी कंपनी में से सरकार की इक्विटी दूसरी सरकारी कंपनी को ट्रांसफर कर दी गई.

कंपनी के विनिवेश से संबंधित पूछताछ के मुद्दे में दीपम से मिली जानकारी पर भी कैग ने असंतोष जाहिर किया है. कैग के मुताबिक कंपनी के फ्री कैश फ्लो, डेट इनवेंट्री व रिफाइनरी मार्जिन के अनुमानों के विषय में दीपम व पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय ने पर्याप्त सपोर्टिग शीट उपलब्ध नहीं कराई. इसके अतिरिक्त कंपनी की फाइनल वैल्यूएशन रिपोर्ट के विषय में पूछे गए सवालों पर दीपम ने तथ्यात्मक जवाब नहीं दिए.

 

डिविडेंड के मसले पर कैग ने बोला है कि सरकारी नियमों के मुताबिक मुनाफा अर्जित करने वाले पीएसयू को 20 परसेंट लाभांश का एलान करना होता है. लेकिन 53 कंपनियों ने इन नियमों का पालन नहीं किया. इसके चलते सरकार को 9471 करोड़ रुपये का नुकसान उठाना पड़ा.